भारत में बिजली संकट गहरा गया है और कई राज्य इमरजेंसी पावर की मांग कर रहे हैं। हाइड्रो पावर में **20%** की भारी गिरावट और कोयला संयंत्रों के मेंटेनेंस के चलते बिजली की कमी दशक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है, जिससे डिस्कॉम (DISCOMs) पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है।
भारत का पावर ग्रिड इस समय बेहद तनावपूर्ण दौर से गुजर रहा है, खासकर शाम के पीक आवर्स के दौरान बिजली की भारी किल्लत देखी जा रही है। गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे औद्योगिक हब पहले ही केंद्र सरकार से इमरजेंसी पावर की मांग कर चुके हैं। सितंबर में देश का बिजली घाटा पिछले एक दशक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया, जिसमें दैनिक पीक शॉर्टेज 7.7 गीगावाट तक दर्ज की गई।
संकट की असली वजह
इस संकट के पीछे कई भौगोलिक और तकनीकी कारण हैं। अल नीनो के कारण कम बारिश से हाइड्रो पावर जनरेशन में 20% की सालाना गिरावट आई है। दूसरी ओर, थर्मल पावर सेक्टर भी क्षमता संबंधी समस्याओं से जूझ रहा है। पीक डिमांड के दौरान लगभग 41 गीगावाट की कोल-फायर्ड क्षमता मेंटेनेंस के कारण बंद थी। इसके अलावा, देश के लगभग आधे कोयला संयंत्रों के पास 25% से भी कम अनिवार्य फ्यूल रिजर्व बचा है।
स्टोरेज की कमी बनी बाधा
भारत ने सोलर एनर्जी में बड़ी बढ़त हासिल की है, लेकिन बैटरी स्टोरेज सिस्टम की कमी के कारण दिन की अतिरिक्त बिजली को शाम के समय इस्तेमाल करना मुश्किल हो रहा है। यही कारण है कि सूर्यास्त के बाद बिजली का गैप बढ़ जाता है, जिससे लोड शेडिंग का खतरा मंडरा रहा है।
सरकार का कड़ा रुख
DISCOMs की वित्तीय सेहत पर पड़ रहे बोझ को कम करने के लिए सरकार ने 'Electricity Act' की धारा 11 (Section 11) लागू कर दी है। इसके तहत, निजी उद्योगों द्वारा संचालित कैप्टिव कोल-फायर्ड प्लांट्स को 2026 के अंत तक अपनी पूरी क्षमता पर काम करने का आदेश दिया गया है ताकि ग्रिड की स्थिरता बनी रहे। निवेशकों की नजरें अब फ्यूल सप्लाई चेन मैनेजमेंट और बैटरी स्टोरेज प्रोजेक्ट्स की गति पर टिकी हैं।
