भारत सरकार अपनी 'Approved List of Models and Manufacturers' (ALMM) का दायरा बढ़ा रही है। अब इसमें बैटरी स्टोरेज और अन्य जरूरी कंपोनेंट्स को भी शामिल किया जाएगा, ताकि विदेशों पर निर्भरता कम हो सके। इस पॉलिसी को **₹2,814 करोड़** के क्रिटिकल मिनरल स्कीम का भी साथ मिला है।
घरेलू मैन्युफैक्चरिंग का नया रोडमैप
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने क्लीन एनर्जी सेक्टर में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कड़े कदम उठाए हैं। 'भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट 2026' में यह स्पष्ट किया गया कि अब ALMM फ्रेमवर्क सिर्फ सोलर मॉड्यूल और विंड टर्बाइन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें बैटरी स्टोरेज जैसी तकनीकें भी शामिल होंगी। इसका मुख्य मकसद विदेशी सप्लायर्स पर निर्भरता खत्म करके एक मजबूत घरेलू इकोसिस्टम तैयार करना है।
कैसे काम करेगी नई रणनीति?
सरकार ने ₹2,814 करोड़ की 'क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग स्कीम' को मंजूरी दी है। यह पैसा लिथियम और निकल जैसे जरूरी खनिजों की प्रोसेसिंग के लिए इस्तेमाल होगा। अब तक भारत फॉसिल फ्यूल इम्पोर्ट में कटौती करके $100 बिलियन से ज्यादा की बचत कर चुका है, और नई पॉलिसी इस बचत को और आगे ले जाने की तैयारी है।
निवेशकों के लिए चेतावनी और चुनौतियां
भले ही यह खबर लंबी अवधि में अच्छी है, लेकिन निवेशकों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- कैपिटल इंटेंसिव: यह सेक्टर भारी कर्ज पर टिका है। पावर सेक्टर के कुल कर्ज का करीब 80% हिस्सा बैंकों से आता है, जिससे कंपनियों पर ब्याज दरें बढ़ने का जोखिम बना रहता है।
- ग्रिड इंटीग्रेशन: बिजली उत्पादन बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन अगर ग्रिड इसे सही तरीके से मैनेज नहीं कर पाया, तो बिजली बर्बाद (curtailment) होने का डर रहता है।
- सप्लाई चेन का जोखिम: अगर क्रिटिकल मिनरल्स की घरेलू प्रोसेसिंग समय पर शुरू नहीं हुई, तो प्रोजेक्ट्स में देरी और लागत बढ़ने का खतरा बरकरार रहेगा।
भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी हासिल करना है, जिसके लिए कुल $220 बिलियन के इन्वेस्टमेंट की जरूरत है। बाजार अब इस बात पर नजर गड़ाए हुए है कि यह पॉलिसी जमीन पर कितनी तेजी से उतरती है।
