भारत ने 2025-26 सीजन के लिए **987 करोड़** लीटर इथेनॉल सप्लाई का लक्ष्य हासिल किया है, जो कुल टारगेट का **82.5%** है। अब चीनी की जगह मक्का (Maize) मुख्य फीडस्टॉक बनकर उभरा है, जिससे डिस्टिलरी कंपनियों के बिजनेस मॉडल में बड़ा बदलाव आया है।
भारत का इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम एक बड़े मील का पत्थर पार कर चुका है। सितंबर 2026 तक देश की कुल इथेनॉल सप्लाई 987 करोड़ लीटर तक पहुंच गई है, जो इस साल के 1,197 करोड़ लीटर के टारगेट का 82.5% हिस्सा है। इस साल की सबसे बड़ी तस्वीर यह है कि अब 71% से ज्यादा इथेनॉल अनाज (Grains) से तैयार हो रहा है।
मक्के का दबदबा
इथेनॉल उत्पादन में मक्का सबसे बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरा है, जिसने कुल सप्लाई में 413 करोड़ लीटर का योगदान दिया है। इसके अलावा, बर्बाद अनाज (Damaged food grains) का उपयोग 70 करोड़ लीटर तक पहुंच गया है, जो 60 करोड़ लीटर के टारगेट से काफी अधिक है। पारंपरिक चीनी आधारित उत्पादन भी स्थिर है, जिसने कुल 282 करोड़ लीटर इथेनॉल सप्लाई किया है। इसमें गन्ने के रस और B-heavy मोलासेस का अहम योगदान रहा है।
निवेशकों के लिए जोखिम और अवसर
अब डिस्टिलरी कंपनियों के लिए 'मल्टी-फीडस्टॉक' प्लांट चलाना जरूरी हो गया है ताकि वे चीनी और अनाज की कीमतों में उतार-चढ़ाव से बच सकें। हालांकि, निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है:
- मार्जिन रिस्क: यदि खराब मानसून या सप्लाई चैन में बाधा के कारण मक्के की कीमतें बढ़ती हैं, तो कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है।
- फूड वर्सेज फ्यूल: 'खाद्य सुरक्षा' (Food security) के मद्देनजर अगर सरकार मक्के के इस्तेमाल पर कोई पाबंदी लगाती है, तो यह डिस्टिलरी कंपनियों के लिए एक बड़ा रिस्क हो सकता है।
निवेशकों को अब सरकारी खरीद कीमतों (Procurement prices) और मक्के की बाजार उपलब्धता पर बारीक नजर रखनी चाहिए, क्योंकि इसी से कंपनियों का आने वाला मार्जिन तय होगा।
