भारत ने **2025-26** सीजन में **987 करोड़ लीटर** एथेनॉल सप्लाई का आंकड़ा छू लिया है। अब पूरा सेक्टर मक्का और चावल जैसे अनाज पर तेजी से निर्भर हो रहा है, जिससे कुल उत्पादन में इनका योगदान **70%** से ज्यादा हो गया है।
भारत का पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग का मिशन एक नए मुकाम पर पहुंच गया है। सितंबर 2026 तक सप्लाई 987 करोड़ लीटर के स्तर को छू गई है, जो कुल आवंटित 1,197 करोड़ लीटर के लक्ष्य का 82.5% है। आंकड़ों से साफ है कि इंडस्ट्री अब शुगर के बजाय अनाज आधारित फीडस्टॉक पर ज्यादा फोकस कर रही है।
अनाज का दबदबा
कुल सप्लाई में 705 करोड़ लीटर यानी 71% से ज्यादा हिस्सा ग्रेन-बेस्ड डिस्टिलरीज से आया है। इसमें मक्के (Maize) का योगदान 413 करोड़ लीटर रहा है। वहीं, फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) द्वारा उपलब्ध कराए गए चावल ने 222 करोड़ लीटर का योगदान दिया है। हालांकि, शुगर सेक्टर ने भी अपनी भूमिका निभाई है और 282 करोड़ लीटर सप्लाई के साथ 97.6% का शानदार फुलफिलमेंट रेट दर्ज किया है।
शुगर मिलों की नई रणनीति
शुगर कंपनियों के लिए अब फीडस्टॉक स्विच करना एक बड़ा बिजनेस एडवांटेज बन गया है। पहले मिलें सिर्फ गन्ने के रस या मोलासेस पर निर्भर थीं, लेकिन खराब मौसम या एक्सपोर्ट पाबंदियों के कारण प्रॉफिट प्रभावित होता था। अब Balrampur Chini Mills और Triveni Engineering जैसी कंपनियां मल्टी-फीडस्टॉक डिस्टिलरीज में निवेश कर रही हैं, ताकि गन्ने की फसल कम होने पर भी रेवेन्यू बना रहे।
निवेशकों के लिए जोखिम और चेतावनी
सेक्टर की ग्रोथ के साथ ही कुछ रिस्क भी हैं जिन पर निवेशकों को नजर रखनी चाहिए। सबसे बड़ा मुद्दा फूड सिक्योरिटी है। अगर सरकार महंगाई को देखते हुए चावल के इस्तेमाल पर रोक लगाती है, तो डिस्टिलरीज को कच्चे माल की कमी हो सकती है। इसके अलावा, मक्के की कीमतों में उतार-चढ़ाव और सरकारी प्रोक्योरमेंट पॉलिसी में बदलाव भी मुनाफे पर दबाव डाल सकते हैं।
