Ethanol Sector Crisis: भारत में इथेनॉल का भारी सरप्लस, **7 अरब लीटर** का स्टॉक बना निवेशकों के लिए सिरदर्द

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Ethanol Sector Crisis: भारत में इथेनॉल का भारी सरप्लस, **7 अरब लीटर** का स्टॉक बना निवेशकों के लिए सिरदर्द

भारत का इथेनॉल उद्योग इस समय भारी आपूर्ति संकट से जूझ रहा है। देश में इथेनॉल की कुल क्षमता **20 अरब लीटर** के पार पहुंच चुकी है, जबकि मांग और ई-20 (E20) मैंडेट के तहत खपत केवल **11 अरब लीटर** की है। ऐसे में **7 अरब लीटर** इथेनॉल का सरप्लस स्टॉक शुगर मिलों और डिस्टिलरी कंपनियों के मुनाफे पर दबाव डाल रहा है।

क्षमता का असंतुलन और मुनाफे पर असर

इथेनॉल सेक्टर में आई इस सुस्ती का मुख्य कारण मांग और सप्लाई का बड़ा अंतर है। अधिकांश डिस्टिलरी प्लांट वर्तमान में अपनी क्षमता का केवल 60% ही इस्तेमाल कर पा रहे हैं। जब प्लांट पूरी क्षमता से नहीं चलते, तो उनकी फिक्स्ड कॉस्ट (Fixed Cost) बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर कंपनियों के नेट प्रॉफिट पर पड़ रहा है। इसके अलावा, भारी इन्वेंट्री के कारण कंपनियों का वर्किंग कैपिटल भी ब्लॉक हो गया है, जिससे कैश फ्लो पर भारी दबाव है।

क्षेत्रीय संकट और महाराष्ट्र की चुनौती

इथेनॉल का यह सरप्लस संकट देश के सभी हिस्सों में एक समान नहीं है। चीनी उत्पादन का हब कहे जाने वाले महाराष्ट्र में हालात ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैं। राज्य में अकेले करीब 2.77 अरब लीटर अतिरिक्त इथेनॉल होने का अनुमान है। लॉजिस्टिक्स और स्टोरेज की लागत बढ़ने के कारण कंपनियों की मार्जिन प्रोफाइल कमजोर हो रही है।

नई राहों की तलाश और सरकारी नियम

इस संकट से निकलने के लिए कंपनियां अब वैकल्पिक रास्तों की तलाश में हैं। Praj Industries जैसी कंपनियां अब 'बायो-आइसोब्यूटैनॉल' (bio-isobutanol) जैसी तकनीकों पर दांव लगा रही हैं ताकि डीजल ब्लेंडिंग में भी इथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाया जा सके। चूंकि भारत में पेट्रोल के मुकाबले डीजल की खपत कहीं अधिक है, इसलिए इस ओर शिफ्ट होने से भविष्य में मांग बढ़ सकती है।

हालांकि, निवेश के लिहाज से सरकार की नीति सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर है। वर्तमान में ई-20 का लक्ष्य अक्टूबर 2026 तक सीमित है, जिससे तत्काल मांग बढ़ने की संभावना कम है। साथ ही, फर्स्ट-जेनरेशन इथेनॉल पर निर्यात प्रतिबंध (Export Restrictions) ने कंपनियों के हाथ बांध रखे हैं। निवेशकों के लिए अब सरकार के नए फैसले और निर्यात नीतियों में ढील ही इस सेक्टर के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.