सितंबर महीने में भारत का डीजल एक्सपोर्ट **6,20,000 बैरल प्रति दिन** के 12 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। यूरोप से बढ़ती डिमांड ने भारतीय रिफाइनर्स के लिए मौके तो खोले हैं, लेकिन निवेशकों को विंडफॉल टैक्स और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के जोखिम को भी ध्यान में रखना होगा।
भारत का डीजल एक्सपोर्ट सितंबर में 6,20,000 बैरल प्रति दिन के 12 महीने के पीक पर पहुंच गया है। इसका मुख्य कारण यूरोप में ईंधन की भारी किल्लत है। आंकड़ों के मुताबिक, यूरोप को रोजाना 2,80,000 बैरल डीजल भेजा गया, जो अगस्त के मुकाबले 80% ज्यादा है। इस स्थिति ने भारत को ग्लोबल फ्यूल सप्लाई चेन में एक अहम सप्लायर के तौर पर स्थापित कर दिया है।
रिफाइनर्स और प्रॉफिट मार्जिन पर असर
एक्सपोर्ट में आई इस तेजी का फायदा उन रिफाइनर्स को मिल रहा है जिनकी ऑपरेशंस क्षमता बड़ी और कुशल है। जामनगर रिफाइनरी (Reliance Industries) इस मामले में सबसे आगे है, क्योंकि SEZ में होने के कारण इसे टैक्स में काफी राहत मिलती है। वहीं, Nayara Energy समेत अन्य रिफाइनर्स के लिए एक्सपोर्ट और घरेलू बाजार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी कंपनियां घरेलू रिटेल डिमांड को पूरा करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं।
मुनाफा और विंडफॉल टैक्स का पेंच
हालांकि यह तेजी आकर्षक लग रही है, लेकिन भारतीय रिफाइनर्स के मुनाफे पर सरकारी विंडफॉल टैक्स (Windfall Tax) का असर पड़ता है। यह टैक्स एक्सपोर्ट के मुनाफे को कैप (Limit) कर देता है। रिफाइनर्स का मार्जिन पूरी तरह से क्रूड ऑयल की खरीद लागत और फाइनल फ्यूल सेलिंग प्राइस के बीच के गैप पर निर्भर करता है।
जोखिम और चुनौतियां
भारत अपनी क्रूड जरूरत का 89% हिस्सा आयात करता है। वेस्ट एशिया में भू-राजनीतिक तनाव किसी भी समय क्रूड सप्लाई में बाधा डाल सकता है, जिससे मार्जिन पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, दीपावली जैसे त्योहारों के दौरान भारत में ईंधन की मांग बढ़ती है। ऐसे में रिफाइनर्स को अपना माल एक्सपोर्ट के बजाय घरेलू बाजार में शिफ्ट करना पड़ सकता है, जिससे आने वाले महीनों में एक्सपोर्ट ग्रोथ में सुस्ती देखी जा सकती है। निवेशकों को रिफाइनिंग मार्जिन और विंडफॉल टैक्स पर सरकारी फैसलों पर कड़ी नजर रखने की जरूरत है।
