ग्लोबल सप्लाई में आई दिक्कतों के बीच भारत का डीजल एक्सपोर्ट अक्टूबर 2026 में 7,00,000 बैरल प्रति दिन के 12 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।
दुनिया भर में फ्यूल की किल्लत के बीच भारतीय रिफाइनरियों ने बाजी मार ली है। अक्टूबर 2026 में भारत का डीजल एक्सपोर्ट 7,00,000 बैरल प्रति दिन के स्तर को पार कर गया है। रूस और मिडिल ईस्ट देशों से सप्लाई में आई कमी का सीधा फायदा भारत को मिल रहा है। भारतीय रिफाइनरियां फिलहाल 100% से ज्यादा की कैपेसिटी पर काम कर रही हैं ताकि डीजल जैसे हाई-वैल्यू फ्यूल का प्रोडक्शन बढ़ाया जा सके।
ग्लोबल मार्केट की स्थिति
साल 2026 की तीसरी तिमाही में ग्लोबल लेवल पर गैस-ऑयल की सप्लाई में 1.7 मिलियन बैरल प्रति दिन की बड़ी गिरावट देखी गई है। रेड सी और होर्मुज स्ट्रेट जैसे रूटों पर शिपिंग में आ रही बाधाओं ने स्थिति को और टाइट कर दिया है, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए मुनाफे के मौके बढ़ गए हैं। क्रूड ऑयल की खरीद और डीजल की बिक्री के बीच के प्राइस गैप से रिफाइनिंग मार्जिन्स में तगड़ा उछाल देखने को मिल रहा है।
घरेलू मांग का दबाव
निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि देश के अंदर भी डीजल की डिमांड बहुत ज्यादा है। त्योहारी सीजन के दौरान कृषि गतिविधियों और फ्रेट मूवमेंट के चलते देश के भीतर फ्यूल की भारी खपत हो रही है। यह घरेलू मांग एक 'नेचुरल सीलिंग' की तरह काम करेगी, जिससे एक्सपोर्ट वॉल्यूम में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी की संभावना कम है।
सरकारी दखल का जोखिम
शेयरधारकों के लिए सबसे बड़ा रिस्क सरकारी पॉलिसी है। इतिहास गवाह है कि जब रिफाइनरियों का एक्सपोर्ट मार्जिन बहुत ज्यादा बढ़ता है, तो सरकार 'विंडफॉल टैक्स' (Windfall Tax) या एक्सपोर्ट ड्यूटी जैसे कदम उठाकर घरेलू सप्लाई और कीमतों को कंट्रोल करने की कोशिश करती है। ऐसे में रिफाइनिंग कंपनियों के निवेशकों को अब घरेलू मांग के आंकड़ों और सरकार की एक्सपोर्ट नीतियों पर बारीकी से नजर रखनी होगी।
