अमेरिका द्वारा भारी एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाने के बाद भारतीय सोलर कंपनियों को झटका लगा है। अब सरकार Exim Bank के क्रेडिट लाइन्स के जरिए सोलर मॉड्यूल्स को अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बाजारों में भेजने की तैयारी कर रही है ताकि प्रोडक्शन कैपेसिटी का पूरा उपयोग हो सके।
भारत सरकार अपनी सोलर एनर्जी एक्सपोर्ट स्ट्रेटेजी में बड़ा बदलाव करने जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य घरेलू मैन्युफैक्चरर्स को सहारा देना है, जो अमेरिका जैसे बड़े बाजार में अचानक आए संकट से जूझ रहे हैं।
अमेरिका का 'टैरिफ वॉर'
अमेरिकी कॉमर्स डिपार्टमेंट ने भारतीय सोलर सेल्स और मॉड्यूल्स पर 249% से ज्यादा की एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी थोप दी है। इस भारी टैरिफ के चलते भारतीय सोलर एक्सपोर्ट्स में बड़ी गिरावट आई है। आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जुलाई के बीच जो एक्सपोर्ट पिछले साल $646 मिलियन था, वह इस साल गिरकर केवल $61 मिलियन रह गया है।
सप्लाई ग्लट (Supply Glut) की चुनौती
इस समय घरेलू कंपनियों के सामने बड़ी समस्या प्रोडक्शन और डिमांड के असंतुलन की है। देश में सोलर मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी बढ़कर 233 GW हो गई है, जबकि सालाना घरेलू मांग सिर्फ 50 GW है। इसके चलते ज्यादातर फैक्ट्रियां अपनी क्षमता के मात्र 35% से 40% पर ही चल रही हैं। इस स्थिति में मार्जिन घटने और कैश फ्लो पर बुरा असर पड़ने का रिस्क बढ़ गया है।
Exim Bank से मिलेगी नई राह
सरकार अब Exim Bank के जरिए विदेशी खरीदारों को क्रेडिट सुविधाएं उपलब्ध कराएगी। इससे अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उभरते बाजारों के लिए भारतीय सोलर मॉड्यूल्स खरीदना आसान होगा। यह कदम चीन की सस्ती कंपनियों से मुकाबला करने में भी मदद करेगा।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या है खास?
भले ही यह सरकारी पहल एक लाइफलाइन की तरह है, लेकिन इन नए बाजारों में चीनी कंपनियों का दबदबा पहले से है। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में कंपनियों की कैपेसिटी यूटिलाइजेशन, नए एक्सपोर्ट ऑर्डर्स और मार्जिन में होने वाले बदलावों पर पैनी नजर रखनी होगी।
