सप्लाई पर ग्रहण और कीमतों में भूचाल
मध्य पूर्व (Middle East) में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारत को अपनी प्राकृतिक गैस सप्लाई में कटौती करनी पड़ रही है। 3 मार्च 2026 को, कतर (Qatar) ने अपने ऊपर हुए कथित ईरानी ड्रोन हमलों के बाद लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) प्रोडक्शन को रोक दिया है। यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि कतर दुनिया की कुल LNG सप्लाई का करीब 20% हिस्सा मुहैया कराता है। इस वजह से ग्लोबल एनर्जी मार्केट में हड़कंप मच गया है।
कीमतों में बेतहाशा उछाल
इस प्रोडक्शन हॉल्ट का असर तुरंत देखने को मिला। यूरोप में TTF गैस फ्यूचर्स की कीमतें 50% तक उछलकर करीब €46-€48 प्रति मेगावाट-घंटा (megawatt-hour) पर पहुंच गईं। वहीं, एशियाई स्पॉट LNG की कीमतें 39% बढ़कर आसमान छूने लगीं। कच्चे तेल (Crude Oil) की बात करें तो ब्रेंट क्रूड (Brent crude) $82 प्रति बैरल के पार निकल गया, जबकि WTI क्रूड में 5% से ज्यादा की तेजी देखी गई।
भारतीय बाजार की घबराहट
इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ा। 2 मार्च 2026 को Nifty Energy इंडेक्स में 1.60% की गिरावट दर्ज की गई। 2 मार्च 2026 तक इस सेक्टर की कुल मार्केट कैप ₹58.75 लाख करोड़ थी, जो अब चिंता का विषय बन गई है।
भारत की एनर्जी सिक्योरिटी पर बड़ा सवाल
भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा LNG इंपोर्टर है। खास बात यह है कि भारत अपनी कुल LNG का करीब 54% हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है, जिसमें कतर और यूएई (UAE) प्रमुख सप्लायर हैं। ऐसे में, कतर के प्रोडक्शन रोकने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। फर्टिलाइजर, केमिकल और रिफाइनिंग जैसे कई बड़े औद्योगिक सेक्टर, जो प्राकृतिक गैस पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, अब वैकल्पिक और शायद महंगी ऊर्जा स्रोतों की तलाश में जुट गए हैं।
सप्लाई चेन पर वैश्विक असर
यह संकट सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े एशियाई देश भी इसी तरह के दबाव का सामना कर रहे हैं और वैकल्पिक कार्गो के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। यूरोप भी, जो सीधे तौर पर मध्य पूर्व पर कम निर्भर है, फिर भी बढ़ी हुई कीमतों से अछूता नहीं है, क्योंकि बाजार आपस में जुड़े हुए हैं।
बड़े खतरे और चुनौतियां
भारत की कुल प्राकृतिक गैस खपत का लगभग 45.3% इंपोर्ट पर निर्भर है। इनमें से ज्यादातर सप्लाई हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे संवेदनशील इलाकों से होकर गुजरती है, जो एक बड़ी चिंता का विषय है। कच्चे तेल के विपरीत, भारत की LPG स्टोरेज कैपेसिटी सीमित है, जो केवल एक तिहाई (one-third) मासिक मांग को पूरा कर पाती है। इस सप्लाई शॉक से औद्योगिक सेक्टरों में महंगाई बढ़ने का खतरा है, जो मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट और उपभोक्ता कीमतों को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, भारत में अंडर-यूटिलाइज्ड रीगैसिफिकेशन टर्मिनल (regasification terminals) और पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी भी एक चुनौती है, जो गैस को अंतिम ग्राहकों तक पहुंचाने में बाधा डालती है।
भविष्य की राह
यह संकट एनर्जी की कीमतों में लंबे समय तक अस्थिरता का संकेत दे रहा है। अगर मध्य पूर्व का तनाव बना रहता है, तो कच्चे तेल की कीमतें $80-$100 प्रति बैरल या इससे भी ऊपर जा सकती हैं। यह स्थिति दुनिया भर में नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable energy) और विविध ऊर्जा स्रोतों की ओर झुकाव को और तेज कर सकती है। भारत के लिए, यह संकट घरेलू उत्पादन बढ़ाने, आयात के रूट को विविधतापूर्ण बनाने और भविष्य के सप्लाई शॉक से निपटने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।