भारत में अप्रैल से जून 2026 के बीच **8.13 टेरावाट-घंटा** सौर ऊर्जा की कटौती की गई है। ग्रिड की सीमित क्षमता और तेजी से बढ़ते सोलर प्रोजेक्ट्स के बीच आया यह असंतुलन रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के मुनाफे पर सीधा असर डाल रहा है।
भारत का सोलर पावर सेक्टर एक बड़ी मुश्किल में फंसा है। सौर ऊर्जा का प्रोडक्शन तो तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इसे ले जाने वाला ग्रिड सिस्टम उस रफ्तार से तैयार नहीं हो पा रहा है। इसका नतीजा यह है कि भारी मात्रा में बिजली बर्बाद हो रही है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय है।
ट्रांसमिशन की सुस्ती और रेवेन्यू का रिस्क
दिक्कत यह है कि सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स तो 12 से 18 महीने में तैयार हो जाते हैं, लेकिन ट्रांसमिशन लाइनें बिछाने में 3 से 5 साल तक का समय लग जाता है। वर्तमान में करीब 33% नए रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स 'टेंपरेरी जनरल नेटवर्क एक्सेस' (T-GNA) पर निर्भर हैं। ग्रिड पर लोड बढ़ते ही सबसे पहले इन्हीं प्रोजेक्ट्स को बंद कर दिया जाता है, जिससे कंपनियों की कमाई पर सीधा असर पड़ता है।
थर्मल पावर बनाम सोलर पावर
ग्रिड ऑपरेटरों के सामने बड़ी चुनौती थर्मल पावर प्लांट्स को लेकर भी है। पुराने कोयला आधारित प्लांट को दिन के समय अचानक बंद करना या उनकी क्षमता कम करना तकनीकी रूप से मुश्किल होता है। इस वजह से ग्रिड ऑपरेटर थर्मल पावर को प्राथमिकता देते हैं और सोलर पावर की कटौती कर दी जाती है, जिससे ग्रिड स्टेबल बना रहे।
बाजार में उठापटक और स्टोरेज की जरूरत
इस संकट का असर Indian Energy Exchange (IEX) पर भी दिख रहा है। दिन में सोलर सप्लाई ज्यादा होने पर कीमतें शून्य के करीब पहुंच जाती हैं, जबकि शाम होते-होते डिमांड बढ़ने पर दाम ₹10 प्रति यूनिट की रेगुलेटरी लिमिट तक पहुंच जाते हैं। भारत का लक्ष्य 2032 तक 74 गीगावाट स्टोरेज क्षमता हासिल करना है, जबकि अभी यह केवल 3 गीगावाट है। भविष्य में निवेश के लिए ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स की रफ्तार और बैटरी स्टोरेज टेंडर्स पर नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है।
