वेस्ट एशिया में जारी तनाव के कारण भारतीय कच्चे तेल की बास्केट **$101.07** प्रति बैरल पर पहुंच गई है। इस तेजी से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) पर दबाव बढ़ गया है, जिसका सीधा असर टायर और एविएशन जैसे सेक्टरों पर भी पड़ रहा है।
कच्चे तेल में उबाल क्यों?
शुक्रवार, 4 सितंबर को भारतीय क्रूड ऑयल बास्केट की कीमत $101.07 प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई है, जो कई हफ्तों में पहली बार $100 का आंकड़ा पार कर गया है। सितंबर का औसत भाव भी बढ़कर $99.38 हो गया है। इस उछाल के पीछे वेस्ट एशिया में बढ़ती अस्थिरता और 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के जरिए सप्लाई बाधित होने का डर सबसे बड़ा कारण है।
ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर मार
क्रूड की बढ़ती कीमतों ने भारतीय सरकारी कंपनियों—Indian Oil Corporation, BPCL और HPCL के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। इन कंपनियों को 'अंडर-रिकवरी' का सामना करना पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पेट्रोल पर प्रति लीटर ₹4.2 और डीजल पर ₹24.9 तक का नुकसान हो रहा है। अगर रिटेल फ्यूल कीमतें स्थिर रहीं, तो इन कंपनियों का मुनाफा और भी कम हो सकता है।
बाजार और अन्य सेक्टरों पर असर
इस खबर के बाद 7 सितंबर को Nifty Oil & Gas इंडेक्स 0.6% से ज्यादा गिर गया। Reliance Industries, Indian Oil, BPCL और HPCL जैसे दिग्गज शेयरों में बिकवाली दिखी। इसका बुरा असर सिर्फ तेल कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पेंट, टायर और एविएशन जैसे सेक्टर भी प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि कच्चे तेल के महंगा होने से उनकी इनपुट कॉस्ट बढ़ जाती है।
अर्थव्यवस्था के लिए चिंता
लंबे समय तक क्रूड का भाव $100 के ऊपर रहने से देश का आयात बिल (Import Bill) बढ़ेगा, जिससे रुपया कमजोर हो सकता है और करंट अकाउंट डेफिसिट पर असर पड़ेगा। साथ ही, इससे देश में महंगाई (Inflation) बढ़ने का खतरा भी पैदा हो गया है। अब निवेशकों की नजर सरकार के अगले कदम और वेस्ट एशिया के हालात पर टिकी है।
