भारत ने भले ही **31** देशों के साथ अपने तेल आयात का नेटवर्क फैला लिया है, लेकिन आंकड़ों की हकीकत कुछ और है। अब भारत अपने कुल कच्चे तेल का **47%** केवल रूस से खरीद रहा है, जो भविष्य में भू-राजनीतिक जोखिमों को बढ़ा सकता है।
भारत ने दुनिया भर के 31 देशों से तेल मंगवाने का दावा तो किया है, लेकिन सप्लाई चेन की गहराई में जाएं तो तस्वीर बहुत अलग दिखती है। पिछले छह महीनों में इराक जैसे पारंपरिक सप्लायर का एक्सपोर्ट शेयर 18% से गिरकर महज 2% रह गया है, जिसकी खाली जगह रूस ने भर दी है।
मार्केट कंसंट्रेशन का खतरा
विशेषज्ञ 'Herfindahl-Hirschman Index' का उपयोग यह मापने के लिए करते हैं कि कोई देश अपने सप्लायर्स पर कितना निर्भर है। यह इंडेक्स 56% उछलकर 2,513 के स्तर पर पहुंच गया है। आर्थिक जानकारों के अनुसार, 2,500 के ऊपर का आंकड़ा यह साफ बताता है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा बहुत कम सप्लायर्स पर टिकी है। हालांकि हाल ही में 10 नए सप्लायर जुड़े हैं, लेकिन उनका कुल योगदान अभी महज 1.4% है, जो सुरक्षा के लिहाज से नाकाफी है।
ट्रेड का बदला हुआ स्वरूप
रूस और भारत के बीच अब व्यापार का तरीका भी बदल गया है। रूसी रिफाइनरियों में ड्रोन हमलों के चलते आई दिक्कतों के बाद, अब भारतीय रिफाइनरी कंपनियां रूस को पेट्रोल जैसे रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स भी एक्सपोर्ट कर रही हैं। यह एक नया 'टू-वे' ट्रेड डायनामिक्स है।
रिस्क और इकोनॉमिक चुनौतियां
ग्लोबल मार्केट में Brent Crude की कीमत $97.31 प्रति बैरल के आसपास मंडरा रही है, जो भारत के आयात बिल और महंगाई पर सीधा असर डाल रही है। सबसे बड़ा डर अमेरिकी प्रतिबंधों (U.S. sanctions) और मैरीटाइम ट्रेड रूट में आने वाली किसी भी रुकावट का है। निवेशकों के लिए अब क्रूड की कीमतों के साथ-साथ इन भू-राजनीतिक मोर्चों पर नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि किसी भी बड़े बदलाव का सीधा असर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ेगा।
