भारत का कच्चा तेल आयात इस अक्टूबर में रिकॉर्ड **5.4 मिलियन बैरल** प्रतिदिन (mb/d) तक पहुंचने की उम्मीद है। रिफाइनर्स अब रूस से हटकर वेस्ट एशियन और अटलांटिक उत्पादकों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं ताकि बढ़ते फ्रेट कॉस्ट को काबू में रखा जा सके।
भारत का एनर्जी प्रोक्योरमेंट एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। अक्टूबर 2026 में देश का कच्चा तेल आयात रिकॉर्ड 5.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mb/d) तक पहुंचने का अनुमान है। यह भारी वॉल्यूम दर्शाता है कि घरेलू रिफाइनर्स अपनी सप्लाई चेन को ग्लोबल प्राइस डायनामिक्स के हिसाब से ढाल रहे हैं।
रूस से मोहभंग की वजह
सबसे बड़ा बदलाव रूसी क्रूड पर घटती निर्भरता है। हालांकि रूस अब भी मुख्य सप्लायर बना हुआ है, लेकिन अक्टूबर में अनुमानित आवक गिरकर 1.97 mb/d रह गई है, जो जुलाई में 2.82 mb/d के पीक पर थी। इसकी मुख्य वजह बढ़ता हुआ फ्रेट और लॉजिस्टिक्स खर्च है, जिसने उन डिस्काउंट्स का फायदा खत्म कर दिया है, जो पहले रूसी तेल को आकर्षक बनाते थे।
OMCs और रिफाइनिंग मार्जिन पर असर
IOCL, BPCL और HPCL जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के निवेशकों के लिए कच्चे तेल की लागत सीधे रिफाइनिंग मार्जिन को प्रभावित करती है। फ्रेट कॉस्ट बढ़ने से तेल की लैंडिंग कॉस्ट बढ़ जाती है, जिससे मुनाफे पर दबाव पड़ता है। अब रिफाइनर्स इराक, कुवैत और सऊदी अरब जैसे वेस्ट एशियन उत्पादकों की ओर लौट रहे हैं, जो डिलीवर्ड बेसिस पर बेहतर कीमत देते हैं।
एनर्जी सिक्योरिटी के लिए नई रणनीति
मध्य पूर्व के अलावा, भारत अब अटलांटिक बेसिन की ओर भी देख रहा है। इस क्षेत्र से आयात दोगुना होकर 1.2 mb/d पहुंच गया है, जिसमें अंगोला और वेनेजुएला महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। यह विविधीकरण (Diversification) भू-राजनीतिक जोखिमों को कम करने और सप्लाई-साइड झटकों से बचने की एक सोची-समझी रणनीति है।
निवेशकों के लिए क्या है जरूरी?
अगली तिमाहियों में रिफाइनर्स का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि वे मार्जिन से समझौता किए बिना सप्लाई चेन को कितना स्थिर रख पाते हैं। ओशन फ्रेट की लागत और ग्लोबल एनर्जी मार्केट में प्राइसिंग ट्रेंड्स पर नजर रखना निवेशकों के लिए बेहद जरूरी है।
