भारत सरकार ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए लिक्विड नेचुरल गैस (LNG) के आपातकालीन भंडार बनाने पर विचार कर रही है। इसके लिए LNG टर्मिनल ऑपरेटरों को अतिरिक्त स्टोरेज कैपेसिटी बनानी होगी, जिसका खर्च बढ़ी हुई रीगैसिफिकेशन फीस (Regasification Tolls) से वसूला जाएगा। वर्तमान में यह फीस **₹65** से **₹80** प्रति mmBtu है। इस कदम से एनर्जी सिक्योरिटी तो बढ़ेगी, लेकिन इंडस्ट्रियल और घरेलू गैस उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ना तय है।
एनर्जी सिक्योरिटी का नया दांव
भारत सरकार अब लिक्विड नेचुरल गैस (LNG) के लिए इमरजेंसी रिजर्व बनाने की नई एनर्जी सिक्योरिटी पॉलिसी पर काम कर रही है। पहले गैस को खाली हो चुके फील्ड्स में स्टोर करने जैसे आइडिया फेल साबित हुए थे क्योंकि वे बहुत महंगे थे। अब सरकार एक नया मॉडल अपना रही है, जिसमें मौजूदा LNG टर्मिनल ऑपरेटरों को अपनी साइट पर ही अतिरिक्त स्टोरेज कैपेसिटी बनानी होगी।
बढ़ी हुई रीगैसिफिकेशन फीस का असर
इस नई इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए फंड जुटाने के वास्ते, सरकार टर्मिनल ऑपरेटरों को अपनी कैपिटल स्पेंडिंग की रिकवरी के लिए रीगैसिफिकेशन टोल बढ़ाने की इजाजत देने पर विचार कर रही है। रीगैसिफिकेशन टोल वो फीस है जो टर्मिनल मालिक इंपोर्टेड LNG को वापस गैस में बदलने के लिए लेते हैं, ताकि उसे सप्लाई किया जा सके। फिलहाल, यह फीस आमतौर पर ₹65 से ₹80 प्रति mmBtu के बीच होती है। अगर यह प्लान आगे बढ़ता है, तो इन बढ़ी हुई लागतों का बोझ गैस इंपोर्टर्स पर पड़ेगा और अंततः पावर प्लांट्स, फर्टिलाइजर मैन्युफैक्चरर्स और सिटी गैस नेटवर्क्स जैसे अंतिम उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा।
टर्मिनल यूटिलाइजेशन पर चुनौती
हालांकि इस मैंडेट का मकसद एनर्जी सप्लाई को सुरक्षित करना है, लेकिन यह मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है। भारत में कई LNG टर्मिनल्स पहले से ही अंडर-यूटिलाइजेशन (अपनी पूरी डिजाइन कैपेसिटी से कम पर चलना) की समस्या से जूझ रहे हैं। इंडस्ट्री एनालिस्ट्स का कहना है कि बढ़ी हुई टोल फीस से लागत बढ़ने पर इन टर्मिनल्स की डिमांड और कम हो सकती है। अगर इंपोर्ट और रीगैसिफिकेशन की लागत बहुत ज्यादा महंगी हो जाती है, तो इंडस्ट्रियल यूजर्स सस्ते एनर्जी विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे देश में नेचुरल गैस की कुल डिमांड पर दबाव बढ़ेगा।
स्ट्रेटेजिक ऑयल रिजर्व्स से तुलना
यह तरीका भारत के स्ट्रेटेजिक क्रूड ऑयल रिजर्व्स को मैनेज करने के तरीके से मिलता-जुलता है। प्राइवेट टर्मिनल ऑपरेटर्स को शामिल करके और यूजर फीस के जरिए लागत की रिकवरी करके, सरकार स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व मॉडल की तरह ही सप्लाई चेन में रुकावटों से बचाव के लिए एक बफर बनाना चाहती है। यह भू-राजनीतिक झटकों से बचाव का एक तरीका है। हालांकि, इस प्लान की फाइनेंशियल सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि घरेलू मार्केट बढ़ी हुई गैस कीमतों को कितनी अच्छी तरह झेल पाता है, बिना कंजम्पशन में बड़ी गिरावट के। निवेशकों को इस मैंडेट के फाइनल स्ट्रक्चर, टर्मिनल ऑपरेटर्स के ऑपरेटिंग मार्जिन पर पड़ने वाले असर और गैस पर निर्भर सेक्टर्स जैसे पावर और फर्टिलाइजर की इनपुट कॉस्ट में संभावित बढ़ोतरी पर प्रतिक्रिया पर नजर रखनी चाहिए।
