सरकार ने GOBARdhan स्कीम के तहत **₹23,731 करोड़** के निवेश को मंजूरी दी है। इस कदम का लक्ष्य **2036** तक कंप्रेस्ड बायोगैस उत्पादन को बढ़ावा देकर एनर्जी इंपोर्ट पर निर्भरता कम करना है।
भारत का एनर्जी ट्रांजिशन अब नई रफ्तार पकड़ रहा है। यूनियन कैबिनेट ने GOBARdhan स्कीम के लिए ₹23,731 करोड़ के भारी आउटले को मंजूरी दे दी है। यह फंड मौजूदा फाइनेंशियल ईयर से लेकर 2036 तक इस्तेमाल किया जाएगा, जिसका मुख्य मकसद देश की एनर्जी जरूरतों को पूरा करने के लिए कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) को नेशनल नेटवर्क से जोड़ना है।
ग्रीन एनर्जी का बढ़ता दायरा
भारत के एनर्जी मिक्स में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। साल 2026 की शुरुआत तक नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी 271.97 GW तक पहुंच चुकी है, जो कुल पावर इंस्टॉलमेंट का 52% से ज्यादा है। इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम की कामयाबी—जो 2014 में महज 1.4% थी और अब 20% के करीब पहुंच गई है—सरकार के लिए एक बड़ा मोटिवेशन है। अब सरकार का फोकस एग्रीकल्चर वेस्ट और यूज्ड कुकिंग ऑयल से बायोफ्यूल बनाने पर है।
हाइड्रोजन ट्रेन और मिशन
ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर में हाइड्रोजन की एंट्री एक बड़े बदलाव का संकेत है। जुलाई 2026 में जींद-सोनीपत रूट पर देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का सफल ट्रायल किया गया। इसके अलावा, नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत ₹19,744 करोड़ का एलोकेशन किया गया है, जिसका लक्ष्य 2030 तक 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन का सालाना उत्पादन करना है।
निवेशकों के लिए जोखिम और संकेत
निवेशकों को यह समझना होगा कि ग्रीन हाइड्रोजन जैसे प्रोजेक्ट्स अभी शुरुआती दौर में हैं और इनमें भारी कैपिटल खर्च होता है। बायोगैस प्लांट्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स है। शहरों में कचरे का कलेक्शन और उसका सही सेग्रेगेशन (Segregation) अभी भी एक बड़ी अड़चन है। इसके अलावा, बायोफ्यूल की कीमतों में उतार-चढ़ाव कंपनियों के मार्जिन पर असर डाल सकता है। निवेशकों को प्राइवेट इन्वेस्टमेंट की रफ्तार और सरकारी पॉलिसी के अपडेट्स पर पैनी नजर रखनी चाहिए।
