सड़क परिवहन मंत्रालय ने विशेष 'फ्लेक्स-फ्यूल' वाहनों के लिए 100% इथेनॉल (E100) के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है। यह कदम तेल आयात पर निर्भरता घटाने के लिए उठाया गया है, लेकिन ऑटो कंपनियों के लिए तकनीकी चुनौतियां और शुगर मिलों के लिए सप्लाई का गणित देखना जरूरी होगा।
सड़क परिवहन मंत्रालय ने नोटिफिकेशन G.S.R. 911(E) जारी कर सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स में बदलाव किया है। अब विशेष रूप से डिजाइन की गई फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों में 100% इथेनॉल का उपयोग किया जा सकेगा। इसमें 3,500 किलो तक के ग्रॉस व्हीकल वेट का दायरा तय किया गया है। यह भारत की एनर्जी स्ट्रेटजी में बड़ा बदलाव है, जो अब E20 ब्लेंडिंग के लक्ष्य से आगे बढ़कर पूर्ण बायोफ्यूल की तरफ बढ़ रही है।
ऑटो सेक्टर की चुनौतियां
इंजन की इंजीनियरिंग को लेकर कंपनियों को बड़ा निवेश करना होगा। फ्लेक्स-फ्यूल इंजन को इथेनॉल की कोरोसिव (Corrosive) प्रकृति को झेलने के लिए खास तरह से तैयार करना पड़ता है। साधारण पेट्रोल गाड़ियों में E100 का उपयोग करने से इंजन तुरंत डैमेज हो सकता है। Maruti Suzuki, Tata Motors और Toyota Kirloskar Motor जैसे दिग्गजों के लिए अब लोकलाइजेशन और इंजन री-इंजीनियरिंग पर होने वाला CAPEX (कैपिटल एक्सपेंडिचर) निवेशकों के लिए मॉनिटर करने वाला अहम फैक्टर होगा।
शुगर कंपनियों के लिए मौका और रिस्क
Balrampur Chini Mills और Shree Renuka Sugars जैसी कंपनियों के लिए यह लंबी अवधि में डिमांड बूस्टर साबित हो सकता है। हालांकि, कच्चा माल (चीनी/गन्ना) की उपलब्धता हमेशा एक बड़ा रिस्क रहती है। सरकार पहले भी फूड सिक्योरिटी और घरेलू कीमतों को कंट्रोल करने के लिए इथेनॉल सप्लाई पर रोक लगा चुकी है। निवेशकों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि सरकार की प्रोक्योरमेंट पॉलिसी कितनी कंसिस्टेंट रहती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की हकीकत
पॉलिसी तो आ गई है, लेकिन इसकी असली परीक्षा फ्यूल स्टेशंस पर होगी। Indian Oil Corporation और HPCL जैसे ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को देश भर में E100 के लिए अलग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना होगा। जब तक पंपों पर यह उपलब्ध नहीं होता, तब तक रिटेल मार्केट में इसकी पहुंच सीमित रहेगी।
