भारत में ग्रीन एनर्जी का बूम! C&I सेक्टर 57 GW तक पहुंचने को तैयार, पर इन Risks पर रखें नज़र

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
भारत में ग्रीन एनर्जी का बूम! C&I सेक्टर 57 GW तक पहुंचने को तैयार, पर इन Risks पर रखें नज़र
Overview

भारत के कमर्शियल और इंडस्ट्रियल (C&I) सेक्टर में रिन्यूएबल एनर्जी (RE) की क्षमता में भारी उछाल आने वाला है। अनुमान है कि **2028** तक यह क्षमता **57 गीगावाट (GW)** तक पहुंच जाएगी, जो कि अगले दो सालों में **17 GW** की जबरदस्त बढ़ोतरी है। इस ग्रोथ की मुख्य वजहें हैं कॉर्पोरेट की सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) की चाहत और बिजली की लागत में बचत।

कॉर्पोरेट्स की हरित ऊर्जा अपनाने की लहर

इस ग्रोथ की असली वजहें कॉर्पोरेट जगत के नेट-ज़ीरो (Net-Zero) लक्ष्य और बिजली की लागत में भारी बचत (Tariff Arbitrage) हैं। 2022 में लाए गए ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस (GEOA) रूल्स इसमें गेम-चेंजर साबित हुए हैं, जिन्होंने कंपनियों को सीधे रिन्यूएबल पावर खरीदने की आज़ादी दी है। राज्य सरकारें भी कई तरह के इंसेंटिव दे रही हैं, जैसे क्रॉस-सब्सिडी, वीलिंग और स्टेट ट्रांसमिशन यूटिलिटी (STU) चार्जेस में छूट। इससे बिजली की लैंडेड कॉस्ट (Landed Cost) ग्रिड टैरिफ के मुकाबले 25-30% तक कम हो जाती है। स्टील, सीमेंट और डेटा सेंटर जैसे ज़्यादा बिजली इस्तेमाल करने वाले सेक्टर सबसे आगे हैं। प्राइवेट इक्विटी (PE) फंड्स भी इस सेक्टर में ज़बरदस्त दिलचस्पी दिखा रहे हैं, क्योंकि C&I प्रोजेक्ट्स में यूटिलिटी-स्केल प्रोजेक्ट्स के मुकाबले ज़्यादा रिटर्न (ROI) मिलता है और पावर परचेज़ एग्रीमेंट (PPA) भी करीब 15 साल की औसत अवधि के साथ काफी स्टेबल होते हैं।

पॉलिसी रिस्क और DISCOMs की वित्तीय चिंताएं

लेकिन इस सुनहरे भविष्य पर कुछ खतरे के बादल भी मंडरा रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि राज्य सरकारों को एक मुश्किल संतुलन बनाना है। एक ओर, उन्हें C&I सेक्टर को रिन्यूएबल एनर्जी अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है, वहीं दूसरी ओर, डिस्ट्रीब्यूशन यूटिलिटीज (DISCOMs) की वित्तीय सेहत का भी ध्यान रखना है। दरअसल, DISCOMs की कमाई का बड़ा हिस्सा इन्हीं बड़े C&I ग्राहकों से आता है, और ओपन एक्सेस को बढ़ावा देने से उनका रेवेन्यू कम हो सकता है। हाल ही में FY25 में DISCOMs ने ₹2,701 करोड़ का प्रॉफिट दिखाया है, जो पिछली बड़ी हानियों से एक अच्छी खबर है। मगर, उनकी वित्तीय स्थिति अभी भी नाज़ुक बनी हुई है। इसके अलावा, ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और ज़मीन अधिग्रहण (Right-of-Way) जैसी दिक्कतें भी प्रोजेक्ट्स में देरी कर रही हैं।

भारत का बड़ा रिन्यूएबल एनर्जी लक्ष्य

यह C&I सेक्टर का विकास भारत के 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल आधारित क्षमता के लक्ष्य को पाने के लिए बेहद ज़रूरी है। सौर ऊर्जा की लागत में भारी गिरावट आई है - जो दस साल पहले ₹11-12 प्रति यूनिट थी, अब घटकर करीब ₹2.50 रह गई है। यह ग्रिड सप्लाई (जो ₹6-8 प्रति यूनिट है) की तुलना में काफी सस्ती है (ओपन एक्सेस या PPA के ज़रिए ₹3-4.5 प्रति यूनिट)। ओपन एक्सेस मार्केट का शेयर कुल सोलर और विंड इंस्टॉलेशन में 2019 के 5% से बढ़कर 2024 तक 34% हो गया है। भारत की कुल रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता फिलहाल करीब 242.63 GW है। अनुमान है कि FY28 तक स्टोरेज-बेक्ड रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता 25-30 GW तक पहुंच जाएगी, जो बिजली की अनिश्चितता को दूर करने में अहम भूमिका निभाएगी।

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