कंपनियां क्यों अपना रही हैं ग्रीन एनर्जी?
भारत में एनर्जी कंजम्पशन का करीब 40-50% हिस्सा कमर्शियल और इंडस्ट्रियल सेक्टर से आता है, और ये सेक्टर अब बड़े पैमाने पर ग्रीन एनर्जी को अपना रहा है। इसकी दो बड़ी वजहें हैं: पहला, बिजली की लागत में भारी बचत और दूसरा, ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी टारगेट्स को पूरा करना। अब सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग ही नहीं, बल्कि क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा सेंटर्स जैसे नए सेक्टर्स भी कार्बन-न्यूट्रल और भरोसेमंद ग्रीन पावर की मांग कर रहे हैं। अनुमान है कि 2030 तक C&I सेक्टर के लिए 60-80 GW रिन्यूएबल एनर्जी कैपेसिटी की जरूरत होगी, जो भारत के 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी के लक्ष्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभाएगा।
ओपन एक्सेस का बढ़ता कमाल
C&I ग्राहकों के लिए ग्रीन एनर्जी खरीदने का सबसे बड़ा आकर्षण ओपन एक्सेस और डायरेक्ट PPAs से मिलने वाली लागत बचत है। जहां ट्रेडिशनल ग्रिड टैरिफ ₹6 से ₹8 प्रति यूनिट तक जा सकते हैं, वहीं लंबी अवधि के PPAs या ओपन एक्सेस के जरिए ग्रीन एनर्जी ₹3-4.5 प्रति यूनिट में मिल जाती है। इसी बड़े अंतर के चलते ओपन एक्सेस मार्केट में जबरदस्त ग्रोथ देखी गई है। 2019 में जहां सोलर और विंड इंस्टॉलेशन में इसका हिस्सा सिर्फ 5% था, वहीं 2024 तक यह बढ़कर 34% हो गया है। ITC जैसी कंपनियों ने इस मॉडल से बिजली के बिल में 25% तक की कटौती दर्ज की है। 2022 से 2024 के बीच C&I ओपन एक्सेस मार्केट 46% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़कर FY2024 तक 18.7 GW की कुल क्षमता तक पहुंच गया है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और पॉलिसी की चुनौतियां
हालांकि ग्रीन एनर्जी की मांग और इसके फायदे साफ हैं, लेकिन इस तेज रफ्तार ग्रोथ में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और रेगुलेटरी पेचीदगियां बड़ी बाधाएं पैदा कर रही हैं। 2022 के ग्रीन ओपन एक्सेस रेगुलेशंस (GOAR) जैसी केंद्रीय नीतियों का राज्यों में धीमा इम्प्लीमेंटेशन हो रहा है, जिससे अलग-अलग राज्यों में चार्जेस और अप्रूवल में काफी भिन्नता है। इन समस्याओं में अलग-अलग ओपन एक्सेस चार्जेस, क्रॉस-सब्सिडी सरचार्जेस (CSS) और एडिशनल सरचार्जेस (AS) शामिल हैं, जो लागत बचत के फायदे को कम कर सकते हैं, खासकर आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में। इसके अलावा, ग्रिड में कंजेशन और पर्याप्त ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से रिन्यूएबल पावर का कर्टेलमेंट (कटौती) भी हो रहा है। साथ ही, बड़े पैमाने पर ओपन एक्सेस अपनाने से राज्य डिस्ट्रीब्यूशन कंपनीज़ (DISCOMs) के रेवेन्यू पर पड़ने वाले असर से भी टेंशन है, जो पॉलिसी में बदलाव या चार्जेस में बढ़ोतरी का कारण बन सकता है। इसी वजह से, कई कंपनियां कुछ सरचार्जेस से छूट पाने के लिए ग्रुप कैप्टिव प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता दे रही हैं।
सेक्टर का भविष्य और उम्मीदें
विश्लेषकों का मानना है कि C&I रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में ग्रोथ जारी रहेगी और 2030 तक यह कुल रिन्यूएबल कैपेसिटी में 60 GW से 80 GW का योगदान देगा। कॉर्पोरेट रिन्यूएबल इंस्टॉलेशन के लिए ग्रोथ CAGR 22-24% रहने का अनुमान है। घटती रिन्यूएबल एनर्जी कॉस्ट और कॉर्पोरेट की बढ़ती सस्टेनेबिलिटी की जरूरतें इस ग्रोथ को बढ़ावा देंगी। हालांकि, इन महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की प्राप्ति काफी हद तक इंफ्रास्ट्रक्चर की रुकावटों को दूर करने और राज्यों द्वारा सहायक नीतियों के पारदर्शी व लगातार इम्प्लीमेंटेशन पर निर्भर करेगी। इन मुख्य चुनौतियों का समाधान न होने पर, C&I ग्रीन पावर को अपनाने में बड़ी देरी और मार्केट वोलेटिलिटी का सामना करना पड़ सकता है।