भारत का ग्रीन फ्यूल गेमचेंजर: SAF उत्पादन में दुनिया को देगा मात, लागत 40% तक कम!

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारत का ग्रीन फ्यूल गेमचेंजर: SAF उत्पादन में दुनिया को देगा मात, लागत 40% तक कम!

एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सस्ते दर पर सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) बनाने की क्षमता रखता है। यह ग्लोबल रेट्स से **40%** तक सस्ता हो सकता है। यह देश की कृषि उपज के अवशेषों और सस्ते सोलर-पावर्ड ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल करके संभव है। इससे न केवल पराली जलाने की समस्या खत्म होगी, बल्कि **$9 बिलियन** का एक्सपोर्ट बिजनेस भी खड़ा हो सकता है।

भारत का ग्रीन फ्यूल का दम

सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) के तेजी से बढ़ते बाजार में भारत के पास एक अनोखा मौका है। इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर (IECC) की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि भारत ग्लोबल बेंचमार्क से 40% तक सस्ता SAF बना सकता है। इसकी वजह है देश में भरपूर मात्रा में उपलब्ध कृषि उपज के अवशेष (agricultural residue) और सस्ता सोलर-पावर्ड ग्रीन हाइड्रोजन।

एक्सपोर्ट से होगी मोटी कमाई

वैश्विक एयरलाइंस और जलवायु लक्ष्यों के चलते SAF की डिमांड आसमान छूने वाली है। रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक वैश्विक बाजार का एक चौथाई हिस्सा कैप्चर करने पर भारत सालाना $9 बिलियन का एक्सपोर्ट रेवेन्यू कमा सकता है। 2040 तक यह आंकड़ा $30 बिलियन तक पहुंच सकता है। इसके लिए भारत को अपने अतिरिक्त कृषि अवशेषों का एक छोटा सा हिस्सा ही इस्तेमाल करना होगा।

पराली जलाने की समस्या का हल

यह रिपोर्ट उत्तर भारत की एक बड़ी पर्यावरणीय समस्या - हर साल सर्दियों में होने वाली पराली जलाने - को एक आर्थिक अवसर में बदलने का रास्ता दिखाती है। जो पराली आज वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण है, वही भविष्य में क्लीन एविएशन फ्यूल के लिए कच्चा माल बन सकती है।

एनर्जी सिक्योरिटी और लागत में कमी

हाल की वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाओं ने भारत जैसे ऊर्जा-आयात करने वाले देशों के लिए तेल की कीमतों की अस्थिरता को उजागर कर दिया है। एविएशन फ्यूल घरेलू एयरलाइंस के लिए एक बड़ा ऑपरेटिंग खर्च है, और घरेलू SAF उत्पादन से ऊर्जा सुरक्षा बढ़ेगी और कीमतों में स्थिरता आएगी।

पावर-एंड-बायोमास-टू-लिक्विड्स (PBtL) प्रक्रिया

IECC रिपोर्ट में पावर-एंड-बायोमास-टू-लिक्विड्स (PBtL) नामक एक उत्पादन विधि का विवरण दिया गया है। इस प्रक्रिया में चावल की भूसी और कपास के डंठल जैसे कृषि कचरे का गैसीकरण (gasification) किया जाता है। इसके बाद इसे सोलर पावर से बने ग्रीन हाइड्रोजन के साथ मिलाया जाता है। प्राप्त सिंथेसिस गैस को फिशर-ट्रॉप्स (Fischer-Tropsch) प्रक्रिया का उपयोग करके लिक्विड फ्यूल, जिसमें एविएशन-ग्रेड फ्यूल भी शामिल है, में बदला जाता है। खास बात यह है कि इस विधि में खाद्य फसलों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं होगी और न ही अतिरिक्त जमीन या ज्यादा सिंचाई की जरूरत पड़ेगी।

किसानों को सीधा फायदा

कृषि अवशेषों के लिए एक वाणिज्यिक बाजार स्थापित होने से किसानों की आय बढ़ेगी और ग्रामीण लॉजिस्टिक्स व्यवसायों को भी बढ़ावा मिलेगा। कंपनियां पहले से ही अवशेषों को इकट्ठा करने, सघन बनाने, स्टोर करने और परिवहन के लिए सप्लाई चेन विकसित कर रही हैं। किसानों को औद्योगिक उपयोगकर्ताओं से जोड़ने के लिए डिजिटल मार्केटप्लेस भी उभर रहे हैं।

कहां होगी शुरुआत?

दिल्ली, पुणे और मुंबई हवाई अड्डों के पास के क्षेत्रों को शुरुआती PBtL प्रोजेक्ट्स के लिए प्रमुख स्थान माना गया है। महाराष्ट्र, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य बायोमास की उपलब्धता, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और मौजूदा बुनियादी ढांचे के कारण पसंदीदा होंगे।

चुनौतियां और सुझाव

हालांकि बायोमास गैसीकरण, फिशर-ट्रॉप्स सिंथेसिस और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन जैसी मुख्य तकनीकें स्थापित हैं, लेकिन भारत में इन्हें व्यावसायिक स्तर पर एकीकृत करना एक बड़ी चुनौती है। रिपोर्ट ने प्रदर्शन प्रोजेक्ट्स शुरू करने, ग्रीन हाइड्रोजन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने, मंजूरियों को सुव्यवस्थित करने और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को मुख्य डेवलपर के रूप में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करने की सिफारिश की है। भारतीय SAF मानकों को अंतरराष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना और घरेलू सम्मिश्रण लक्ष्यों का विस्तार करना भी महत्वपूर्ण है।

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