ऊर्जा को बनाया रणनीतिक स्तंभ
साल 2026-27 के बजट में भारत की ऊर्जा नीति को एक नई पहचान मिली है। इसे आर्थिक स्थिरता (Economic Resilience) और जलवायु लक्ष्यों (Climate Objectives) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। इस नीति में तत्काल सप्लाई की ज़रूरतें और लंबे समय की स्थिरता, दोनों का ध्यान रखा गया है। इसमें रिन्यूएबल एनर्जी, न्यूक्लियर पावर, ग्रिड आधुनिकीकरण और ट्रांज़िशन फ्यूल्स को एक साथ शामिल किया गया है।
रिन्यूएबल एनर्जी और स्टोरेज को बढ़ावा
रिन्यूएबल एनर्जी की लागत कम करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। लिथियम-आयन सेल मैन्युफैक्चरिंग (Lithium-ion cell manufacturing) और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के लिए कैपिटल गुड्स (Capital Goods) पर कस्टम ड्यूटी में छूट दी गई है। इन पहलों का मकसद 'आत्मनिर्भर भारत' (Atmanirbhar Bharat) के तहत डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को मज़बूत करना और ग्रिड-स्केल स्टोरेज को सहारा देना है, जो रिन्यूएबल एनर्जी स्रोतों की रुक-रुक कर होने वाली सप्लाई को संभालने के लिए बेहद ज़रूरी है।
सोलर पावर पर ज़ोर
सोलर सेक्टर को ज़बरदस्त समर्थन मिला है। बजट में पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना (PM Surya Ghar Muft Bijli Yojana) के लिए ₹22,000 करोड़ आवंटित किए गए हैं। वहीं, कुसुम (KUSUM) योजना के लिए ₹5,000 करोड़ और ग्रिड-कनेक्टेड सोलर प्रोजेक्ट्स (Grid-connected solar projects) के लिए ₹1,775 करोड़ का फंड रखा गया है। सोलर वेफर्स पर ड्यूटी में कोई प्रभावी बढ़ोतरी न करके, मैन्युफैक्चरर्स को भरोसा दिलाया गया है।
न्यूक्लियर पावर का लॉन्ग-टर्म विज़न
न्यूक्लियर पावर के विस्तार के लिए लॉन्ग-टर्म विज़िबिलिटी (Long-term visibility) बढ़ाई गई है। इसके तहत, न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स के लिए कस्टम ड्यूटी में छूट को साल 2035 तक बढ़ा दिया गया है, चाहे प्रोजेक्ट की कैपेसिटी कुछ भी हो। यह न्यूक्लियर एनर्जी को एक ज़रूरी नॉन-कार्बन बेसलोड एनर्जी सोर्स (Non-carbon baseload energy source) के तौर पर सपोर्ट करता है।
ट्रांज़िशन फ्यूल्स और डीकार्बोनाइज़ेशन
ज़्यादा क्लीन फ्यूल विकल्पों (Cleaner alternatives) को बढ़ावा देने के लिए, ब्लेंडेड सीएनजी/पीएनजी (Blended CNG/PNG) में इस्तेमाल होने वाले बायोगैस (Biogas) पर पूरी एक्साइज ड्यूटी (Excise exclusion) से छूट दी गई है। इसके अलावा, कार्बन कैप्चर, यूटिलाइज़ेशन और स्टोरेज (CCUS) प्रोजेक्ट्स के लिए अगले पांच सालों में ₹20,000 करोड़ का बड़ा आवंटन किया गया है। इससे भारत इंडस्ट्रियल डीकार्बोनाइज़ेशन (Industrial decarbonisation) के लिए तैयार होगा।
इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग और ग्रिड स्टेबिलिटी
पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर (Public capital expenditure) का इस्तेमाल ज़रूरी ग्रिड अपग्रेड (Grid upgrades) और ट्रांसमिशन रिलायबिलिटी (Transmission reliability) के लिए किया जाएगा। पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC) और रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन (REC) के पुनर्गठन (Restructuring) का लक्ष्य पावर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए लॉन्ग-टर्म फाइनेंसिंग को मज़बूत करना है।
निवेश का आउटलुक (Investment Outlook)
एनर्जी सेक्टर में निवेश का परिदृश्य (Investment landscape) अब सिर्फ क्षमता बढ़ाने से आगे बढ़ रहा है। भविष्य में वही कंपनियां आगे बढ़ेंगी जो सिस्टम मैनेजमेंट (Systems management), स्टोरेज (Storage), फाइनेंसिंग (Financing) और ट्रांज़िशन टेक्नोलॉजी (Transition technologies) को अपनाने में माहिर होंगी, और बजट की इस रणनीतिक दिशा के साथ तालमेल बिठा पाएंगी।