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India का तेल आयात: रूस की चांदी, मध्य पूर्व में टेंशन से शिपिंग कॉस्ट आसमान पर

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
India का तेल आयात: रूस की चांदी, मध्य पूर्व में टेंशन से शिपिंग कॉस्ट आसमान पर
Overview

मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई में आ रही रुकावटों के चलते भारत ने अपनी तेल आयात (Crude Oil Import) की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। मार्च में भारत का तेल आयात नौ महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जिसमें रूस से हुई खरीद में भारी इज़ाफा देखा गया। साथ ही, भारत ने अंगोला (Angola) जैसे देशों से भी विकल्प तलाशना शुरू कर दिया है। हालांकि, इस बदलाव के साथ ही शिपिंग लागत (Shipping Costs) में जबरदस्त वृद्धि और बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।

रूस से तेल आयात में बड़ी बढ़ोतरी, अंगोला बना नया सहारा

मार्च 2026 में भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को लेकर एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला। रूस से तेल का आयात पिछले महीने की तुलना में 89% बढ़कर 55.5 मिलियन बैरल तक पहुंच गया। यह बढ़ोतरी मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और हॉरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे प्रमुख व्यापार मार्गों में आई रुकावटों के कारण हुई है। हॉरमुज जलडमरूमध्य से दुनिया के लगभग 20% दैनिक तेल शिपमेंट गुजरते हैं, और यहां की अस्थिरता भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

इस बीच, भारत ने अंगोला (Angola) से भी तेल का आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया। मार्च में अंगोला से आयात 255% बढ़कर 10.2 मिलियन बैरल तक पहुंच गया। यह कदम रूस पर निर्भरता कम करने और सप्लाई के वैकल्पिक रास्ते खोजने की कोशिश को दर्शाता है।

शिपिंग लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी, जेब पर भारीThe costs

रूस और अंगोला से तेल आयात बढ़ाने की यह रणनीति भारत की जेब पर भारी पड़ रही है। कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है, ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) $100 प्रति बैरल के पार जाकर 31 मार्च 2026 तक $112.78 के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले महीने से 37.20% ज़्यादा है।

इससे भी बड़ी चिंता शिपिंग लागत (Shipping Costs) में आई बेतहाशा बढ़ोतरी है। मध्य पूर्व से एशिया तक कच्चे तेल ले जाने वाले सुपरटैंकर (VLCCs) का किराया फरवरी के अंत में $424,000 प्रति दिन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो सामान्य दिनों से 300% से भी ज़्यादा है। लाल सागर (Red Sea) और हॉरमुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के कारण जहाजों को केप ऑफ गुड होप (Cape of Good Hope) से होकर लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है। इससे यात्रा का समय और लागत दोनों बढ़ गए हैं, जिससे भारत के लिए आयातित तेल की कीमत और ज़्यादा हो गई है।

आर्थिक दबाव बढ़ा: रुपया कमजोर, महंगाई की चिंता

भारत अपनी ज़रूरत का 80-89% कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल की ऊंची कीमतों और बढ़ती शिपिंग लागत का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। मार्च 2026 में भारतीय रुपया (Indian Rupee) डॉलर के मुकाबले लगभग ₹92 के निचले स्तर पर आ गया। तेल की ऊंची कीमतों और कमजोर रुपये के इस दोहरे वार ने देश के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को बढ़ाने की आशंका पैदा कर दी है।

विश्लेषकों का मानना है कि ब्रेंट क्रूड की हर $10 की बढ़ोतरी पर चालू खाता घाटा जीडीपी (GDP) के 0.5% तक बढ़ सकता है। इससे आर्थिक विकास दर में 0.5% तक की कमी आ सकती है और महंगाई (Inflation) बढ़ सकती है। ऐसे में, भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India - RBI) को ग्रोथ धीमी होने के बावजूद ब्याज दरें बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ सकता है।

एशिया की ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराए बादल

होरमुज जलडमरूमध्य जैसे प्रमुख समुद्री रास्तों पर बढ़ते संकट का असर पूरे एशिया पर दिख रहा है। भारत की रणनीति को दुनिया भर से देखा जा रहा है। वहीं, चीन अपनी बड़ी तेल भंडार क्षमता और रूस से पाइपलाइन तेल जैसे विविध स्रोतों के कारण थोड़ा बेहतर स्थिति में दिख रहा है, लेकिन वह भी एलएनजी (LNG) सप्लाई में रुकावटों को लेकर चिंतित है। जापान (Japan) और दक्षिण कोरिया (South Korea) जैसे पूर्वी एशियाई देशों पर ज़्यादा खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि वे तेल आयात के लिए मध्य पूर्व पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं।

आगे की राह: अनिश्चितता और रणनीतिक संतुलन

भविष्य में, मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति भारत के ऊर्जा परिदृश्य को आकार देती रहेगी। विश्लेषक उम्मीद कर रहे हैं कि तेल और शिपिंग की ऊंची लागतें अभी बनी रहेंगी। भारत को सप्लाई चेन की चुनौतियों से निपटना होगा, वैश्विक व्यापार में हो रहे बदलावों के अनुकूल खुद को ढालना होगा और घरेलू ऊर्जा सुरक्षा को मज़बूत करना होगा। इन रणनीतिक बदलावों का सीधा असर भारत के व्यापक आर्थिक पथ पर पड़ेगा, जिसके लिए सावधानीपूर्वक राजकोषीय प्रबंधन और महंगाई को नियंत्रित करने वाली नीतियों की ज़रूरत होगी।

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