पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट्स: स्वदेशी तकनीक का बढ़ता दबदबा
भारत अक्षय ऊर्जा (Renewable Energy) की स्थिरता के लिए पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट्स (PSP) पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये प्रोजेक्ट्स अपने इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल कॉम्पोनेन्ट्स के लिए स्वदेशी तकनीक और मटेरियल का इस्तेमाल करते हैं। यह बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) से बिल्कुल अलग है, जो काफी हद तक आयातित पुर्जों पर निर्भर है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) का कहना है कि PSP, आठ घंटे तक डिस्चार्ज की सुविधा के साथ गीगावाट-स्केल स्टोरेज प्रदान कर सकते हैं। इनकी ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी कमाल की है और लाइफ साइकल लगभग 100 साल तक है। वहीं, BESS अभी 2-4 घंटे की छोटी अवधि के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं, और इनमें स्थानीयकरण (Localization) की चुनौतियां हैं। हालांकि, यूनियन बजट 2026 में लिथियम-आयन सेल मैन्युफैक्चरिंग के लिए कैपिटल गुड्स पर कस्टम ड्यूटी में छूट दी गई थी।
भारत की ऊर्जा स्टोरेज की खाई पाटना
भारत के पास 267 गीगावाट (GW) तक की पंप स्टोरेज क्षमता का अनुमान है, जो 2034-35 तक 149-161 GW की अनुमानित ऊर्जा स्टोरेज की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। दिसंबर 2025 तक, भारत में 7,176 MW PSPs स्थापित हो चुके हैं, और 11,620 MW पर काम चल रहा है। 9,580 MW के लिए डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार हैं, और एक बड़े 74,940 MW के लिए सर्वे का काम जारी है।
निवेश की राह में बाधाएं और नीतिगत अनिवार्यताएं
PSP के विकास में काफी पूंजी लगती है, और 2036 तक इसके लिए अनुमानित ₹5.8 लाख करोड़ के निवेश की आवश्यकता होगी। इन प्रोजेक्ट्स में बड़े पैमाने पर सिविल वर्क शामिल होते हैं और ये अक्सर दूरदराज के इलाकों में होते हैं, जिसके लिए काफी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट की जरूरत पड़ती है। इतनी बड़ी पूंजी जुटाने के लिए एक संयुक्त प्रयास की आवश्यकता है, जिसमें सरकार और मल्टीलेटरल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस को डेडिकेटेड फंडिंग मैकेनिज्म स्थापित करने में अहम भूमिका निभानी होगी। रेगुलेशन को सरल बनाना और इंफ्रास्ट्रक्चर व मौद्रिक सहायता प्रदान करना, रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता में हुई सफलताओं से सीख लेकर प्रोजेक्ट्स को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताएं हैं।