अगस्त में भारत ने यूरोप को होने वाली डीजल सप्लाई में **60%** हिस्सेदारी दर्ज की है। रूस और अमेरिका से सप्लाई घटने के बाद भारतीय रिफाइनरियों की डिमांड बढ़ गई है, लेकिन विंडफॉल टैक्स का बोझ निवेशकों के लिए चिंता का विषय है।
भारत वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरा है। अगस्त के महीने में, बाब-अल-मंडेब रूट से गुजरने वाले 60% डीजल की आपूर्ति अकेले भारत ने की है। यह बदलाव तब आया है जब रूस और अमेरिका जैसे पारंपरिक सप्लायर्स यूरोप की जरूरतें पूरी करने में संघर्ष कर रहे हैं।
ग्लोबल सप्लाई चेन में हलचल
रूस पर लगे प्रतिबंधों और रिफाइनरियों पर हुए 32 ड्रोन हमलों के कारण, रूसी सी-बॉर्न फ्यूल एक्सपोर्ट में भारी गिरावट आई है। अगस्त के अंत में रूस का एक्सपोर्ट घटकर 1.5 लाख बैरल प्रति दिन रह गया, जो कि 5 साल के औसत से 81% कम है। वहीं, अमेरिका से यूरोप को होने वाली डीजल शिपमेंट में भी 35% की कमी देखी गई है।
रिफाइनरियों के सामने चुनौतियां
एक्सपोर्ट के बड़े मौकों के बावजूद भारतीय रिफाइनरियों की राह आसान नहीं है। सबसे पहली चुनौती कच्चे तेल की उपलब्धता है, जो पिछले साल के 4.8 मिलियन बैरल प्रति दिन से गिरकर अगस्त में 3.8 मिलियन बैरल प्रति दिन पर आ गई है।
इसके अलावा, सरकार द्वारा 1 सितंबर, 2026 से पेट्रोल एक्सपोर्ट पर फिर से लागू किया गया 'विंडफॉल टैक्स' मुनाफे पर सीधा प्रहार करेगा। यह टैक्स सेक्टर की उन कंपनियों के लिए बड़ा सिरदर्द है जो विदेशी बाजारों से मोटा मुनाफा कमाने की उम्मीद कर रही थीं।
आगे की राह
निवेशकों को अब यह देखना होगा कि कंपनियां घरेलू डिमांड और एक्सपोर्ट के बीच कैसे संतुलन बनाती हैं। अक्टूबर में दिवाली के दौरान भारत में फ्यूल की खपत बढ़ने की उम्मीद है। यदि घरेलू मांग में उछाल आता है, तो रिफाइनरियों को निर्यात कम करना पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों और टैक्स के बीच का यह तालमेल ही तय करेगा कि रिफाइनरी शेयरों में तेजी टिकेगी या नहीं।
