सर्दियों की दस्तक से पहले यूरोप में ईंधन की भारी किल्लत है। इस संकट के बीच भारत अब Bab-el-Mandeb रूट से गुजरने वाले **60%** डीजल की सप्लाई कर रहा है। रूस और अमेरिका से सप्लाई घटने के कारण भारतीय रिफाइनरियों की मांग में जोरदार उछाल आया है।
यूरोप की बढ़ती निर्भरता
अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, भारत यूरोप के लिए डीजल का सबसे भरोसेमंद स्रोत बन गया है। Bab-el-Mandeb समुद्री मार्ग से होने वाली ईंधन सप्लाई में भारत की हिस्सेदारी 60% तक पहुंच गई है। यह बदलाव तब आया है जब ग्लोबल मार्केट में दूसरे देशों से आने वाली सप्लाई में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
क्यों कम हुई ग्लोबल सप्लाई?
यूरोप में ईंधन के इस 'वैक्यूम' के पीछे मुख्य वजह रूस और अमेरिका की सप्लाई में आई कमी है। रूस के गैसोइल और डीजल एक्सपोर्ट में 81% की बड़ी गिरावट आई है, जो पिछले 5 साल के औसत से काफी कम है। रूस में रिफाइनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की दिक्कतें और एक्सपोर्ट बैन को 30 सितंबर 2026 तक बढ़ाए जाने के कारण बाजार से बड़ी मात्रा में ईंधन गायब हो गया है। इसके अलावा, अमेरिका से यूरोप जाने वाली शिपमेंट्स भी 5,40,000 बैरल प्रतिदिन से घटकर 3,50,000 बैरल प्रतिदिन के स्तर पर आ गई हैं।
निवेशकों के लिए मतलब (Crack Spread)
जब ग्लोबल सप्लाई सीमित होती है, तो क्रूड ऑयल की लागत और डीजल के दाम के बीच का अंतर—जिसे 'Crack Spread' कहा जाता है—बढ़ जाता है। भारतीय रिफाइनर्स के लिए यह स्थिति मुनाफे का एक बड़ा मौका है। यूरोप के खरीदार भारतीय ईंधन के लिए बड़ी कीमतें चुकाने को तैयार हैं, जिससे रिफाइनरियों के रेवेन्यू में इजाफा हो सकता है।
क्या हैं रिस्क फैक्टर्स?
हालांकि मांग बहुत अधिक है, लेकिन निवेशकों को सावधानी भी बरतनी चाहिए। भारत का क्रूड ऑयल इनटेक अगस्त में गिरकर 3.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है, जो पिछले साल 4.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन था। इसके अलावा, भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) शिपिंग के लिए बड़ा खतरा हैं। Strait of Hormuz या Bab-el-Mandeb जैसे रास्तों पर कोई भी विवाद टैंकरों की आवाजाही को रोक सकता है, जिससे फ्रेट कॉस्ट बढ़ सकती है। आने वाले समय में घरेलू ऊर्जा सुरक्षा बनाम यूरोप को एक्सपोर्ट करने की होड़, भारतीय कंपनियों के लिए एक अहम चुनौती बनी रहेगी।
