भारत ने 2032 तक अपनी बैटरी स्टोरेज क्षमता को **236.22 GWh** तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इस बदलाव के लिए **₹3.49 ट्रिलियन** के बड़े निवेश की जरूरत होगी, लेकिन निवेशकों को इंपोर्ट पर निर्भरता और प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन जैसी चुनौतियों पर नजर रखनी चाहिए।
ग्रीन एनर्जी की ओर बड़ा कदम
भारत अपने पावर ग्रिड को मजबूत करने के लिए बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) का तेजी से विस्तार कर रहा है। वित्त वर्ष 2031-32 के अंत तक 236.22 GWh का लक्ष्य रखा गया है, जो मौजूदा स्तर से 7 गुना ज्यादा है। यह रफ्तार सोलर और विंड एनर्जी की अस्थिरता को मैनेज करने के लिए बेहद जरूरी है ताकि देश को चौबीसों घंटे बिजली मिल सके।
सरकार का भारी-भरकम निवेश
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बैटरी स्टोरेज में ₹3.49 ट्रिलियन की पूंजी चाहिए, जबकि पूरे स्टोरेज सेक्टर में कुल निवेश ₹4.79 ट्रिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। सरकार की मदद के लिए PM-DHARA स्कीम लॉन्च की गई है, जिसमें ₹500 बिलियन का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य 50 GWh स्टोरेज क्षमता का निर्माण करना है।
वर्तमान स्थिति और पाइपलाइन
अगस्त 2026 तक भारत के पास 9.08 GWh की ऑपरेशनल बैटरी क्षमता है। फिलहाल 79.92 GWh क्षमता का काम चल रहा है, जबकि टेंडर और अवार्ड्स को मिलाकर कुल क्षमता 176.66 GWh तक पहुंच गई है। 2026 की पहली छमाही में ही 8.2 GWh की नई क्षमता जोड़ी गई है, जो पिछले सालों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।
निवेशकों के लिए जोखिम और चेतावनी
सेक्टर में चमक तो दिख रही है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं:
- इंपोर्ट पर निर्भरता: भारत की लिथियम-आयन बैटरी के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है, जिससे सप्लाई चेन में उतार-चढ़ाव का खतरा रहता है।
- एग्जीक्यूशन रिस्क: कुछ प्रोजेक्ट्स ऐसी कंपनियों को दिए गए हैं, जिनके पास काम का अनुभव सीमित है।
- प्राइसिंग प्रेशर: 2026 में ग्लोबल लेवल पर बैटरी की कीमतें बढ़ने से डेवलपर्स के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है, खासकर उनके लिए जिन्होंने पुराने टेंडर्स में कम टैरिफ पर समझौता किया है।
आने वाले समय में प्रोजेक्ट कमीशनिंग की रफ्तार और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को मिलने वाली सरकारी मदद ही इस सेक्टर की लंबी अवधि की ग्रोथ तय करेगी।
