Energy Sector Update: भारत की बैटरी स्टोरेज क्षमता में आएगा **91%** का उछाल, 2032 तक बदलेगी तस्वीर

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AuthorNeha Patil|Published at:
Energy Sector Update: भारत की बैटरी स्टोरेज क्षमता में आएगा **91%** का उछाल, 2032 तक बदलेगी तस्वीर

भारत का बैटरी एनर्जी स्टोरेज सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में **6.3 GWh** से शुरू होकर इसके 2032 तक **302 GWh** तक पहुंचने का अनुमान है। इस **91%** की सालाना ग्रोथ के साथ निवेशकों को सरकारी प्रोत्साहनों और इंपोर्ट पर निर्भरता जैसे रिस्क पर भी नजर रखनी होगी।

भारत का पावर इंफ्रास्ट्रक्चर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। जैसे-जैसे देश में सोलर और विंड एनर्जी का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ग्रिड को स्टेबल रखने के लिए बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) की भूमिका अहम होती जा रही है। Nuvama की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत की स्टोरेज क्षमता फाइनेंशियल ईयर 2026 के 6.3 GWh से बढ़कर 2032 तक 302 GWh होने की उम्मीद है। यह 91% की सालाना ग्रोथ (CAGR) भविष्य के बड़े बदलाव का संकेत है।

पावर ग्रिड की स्थिरता और जरूरत

कोयला या गैस पावर प्लांट की तरह सोलर और विंड एनर्जी 24 घंटे उपलब्ध नहीं रहती। इसलिए, रिन्यूएबल पावर को स्टोर करना जरूरी है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) का अनुमान है कि 2032 तक देश को 236 GWh से अधिक स्टोरेज की जरूरत होगी। इसे देखते हुए अब बड़ी पावर कंपनियां अपने बिजनेस मॉडल में स्टोरेज को प्राथमिकता दे रही हैं।

सरकारी प्रोत्साहन और लोकल मैन्युफैक्चरिंग

वर्तमान में भारत अपनी बैटरी जरूरतों का 89% आयात (import) करता है। इसे बदलने के लिए सरकार ने ₹181 अरब का प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) फंड जारी किया है, जिसका लक्ष्य 50 GWh की सेल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता हासिल करना है। डोमेस्टिक प्रोडक्शन बढ़ने से कंपनियों की लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी में सुधार होने की पूरी उम्मीद है।

निवेशकों के लिए चुनौतियां और रिस्क

ग्रोथ की इस कहानी में कुछ रिस्क भी हैं। फिलहाल, भारत में बैटरी स्टोरेज का 88% हिस्सा सिर्फ गुजरात और राजस्थान तक ही सीमित है, जो एक भौगोलिक असंतुलन (geographic concentration) है। इसके अलावा, पावर परचेज एग्रीमेंट में देरी और ग्रिड कनेक्टिविटी जैसी परेशानियां भी काम की रफ्तार को धीमा कर सकती हैं।

निवेशकों को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि स्टोरेज प्रोजेक्ट्स हासिल करने के लिए कंपनियां काफी आक्रामक तरीके से बिडिंग (bidding) कर रही हैं। इससे प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बन सकता है। साथ ही, लिथियम-आयन के अलावा सोडियम-आयन जैसी नई टेक्नोलॉजी पर शिफ्ट होने की संभावनाएं भी बाजार की दिशा तय करेंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.