भारत में एडवांस्ड बैटरी सेल की मांग 2030 तक सालाना 39% की दर से बढ़ने की उम्मीद है। इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और एनर्जी स्टोरेज सेक्टर इस ग्रोथ को लीड करेंगे। सरकार की ₹18,100 करोड़ की इंसेंटिव स्कीम और इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने के लिए लोकल मिनरल सप्लाई चेन पर फोकस इस बदलाव को सपोर्ट करेगा।
Detailed Coverage
बैटरी मार्केट में बंपर ग्रोथ की तैयारी
भारत का एडवांस्ड रिचार्जेबल बैटरी सेल मार्केट तेजी से विस्तार की ओर बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2030 तक इसकी मांग सालाना 39% की कंपाउंड एनुअल रेट से बढ़ेगी। इस ग्रोथ का मुख्य कारण इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) की तरफ बढ़ता झुकाव और बड़े पैमाने पर एनर्जी स्टोरेज सिस्टम की बढ़ती जरूरत है। जहां इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरीज की मांग 35% की दर से बढ़ने की उम्मीद है, वहीं बैटरी एनर्जी स्टोरेज सेक्टर इससे भी तेज रफ्तार से बढ़ेगा, जिसके 78% सालाना ग्रोथ का अनुमान है।
सरकारी नीतियां और डोमेस्टिक कैपेसिटी
इस ग्रोथ को सपोर्ट देने के लिए, भारत सरकार ने ₹18,100 करोड़ की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम लॉन्च की है। इसका मकसद कंपनियों को 50 गीगावाट-घंटे (GWh) की डोमेस्टिक सेल मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी बनाने में मदद करना है। यह इनिशिएटिव इंपोर्टेड बैटरी मटीरियल पर भारत की निर्भरता कम करने के बड़े प्लान का अहम हिस्सा है। 10 से ज्यादा मैन्युफैक्चरर्स ने देश के अंदर लगभग 178 GWh मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी स्थापित करने की योजना का ऐलान किया है। इन प्रोजेक्ट्स का लक्ष्य एक लोकल सप्लाई चेन तैयार करना है जो ऑटो और एनर्जी दोनों सेक्टर की जरूरतों को पूरा कर सके।
रॉ मैटेरियल सिक्योरिटी और जोखिम
लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और ग्रेफाइट जैसे जरूरी रॉ मैटेरियल्स की सुरक्षा इंडस्ट्री के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इस समस्या से निपटने के लिए, सरकार ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (National Critical Mineral Mission) पेश किया है। इस प्रोग्राम का उद्देश्य डोमेस्टिक एक्सप्लोरेशन, प्रोसेसिंग और रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना है। निवेशकों के लिए, इस डेवलपमेंट की सफलता कंपनी की प्रोजेक्ट कॉस्ट मैनेज करने, भरोसेमंद मिनरल सप्लाई हासिल करने और डिमांड को पूरा करने के लिए प्रोडक्शन बढ़ाने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
ग्लोबल मार्केट का आउटलुक
जहां भारत तेजी से विस्तार का लक्ष्य रख रहा है, वहीं इन बैटरी सेल्स का ग्लोबल मार्केट भी बदल रहा है। 2030 तक ग्लोबल डिमांड के 20% सालाना बढ़ने का अनुमान है, जो 2030 से 2035 के बीच घटकर लगभग 8% रह जाएगा। दुनिया भर में कैपेसिटी बढ़ने के साथ, इंडस्ट्री को सप्लाई की डिमांड से ज्यादा होने का जोखिम है, जिससे मैन्युफैक्चरर्स की प्राइसिंग और प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है। निवेशकों को डोमेस्टिक प्लेयर्स पर नजर रखनी चाहिए कि वे इन ग्लोबल बदलावों के साथ-साथ अपने बड़े मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स को कैसे एग्जीक्यूट करते हैं। प्रोजेक्ट टाइमलाइन, रॉ मैटेरियल सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट्स और मिनरल सोर्सिंग से जुड़ी सरकारी नीतियों में बदलाव पर भविष्य के अपडेट्स इस सेक्टर की कंपनियों की लॉन्ग-टर्म संभावनाओं का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
