भारत और ऑस्ट्रेलिया ने रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में अपनी साझेदारी को और मजबूत किया है। गुजरात में एक नए सोलर ट्रेनिंग सेंटर की शुरुआत की गई है, जहाँ **2,000** टेक्नीशियनों को सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए तैयार किया जाएगा।
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट नॉन-फॉसिल फ्यूल कैपेसिटी का बड़ा लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुशल कामगारों की भारी जरूरत है। गुजरात में खुला यह ट्रेनिंग सेंटर इसी दिशा में एक बड़ा कदम है, जो सोलर प्रोजेक्ट्स के इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस के लिए मैनपावर तैयार करेगा।
ग्रीन हाइड्रोजन और आत्मनिर्भरता
दोनों देशों के बीच सिर्फ सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं, बल्कि ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी रिसर्च और डेवलपमेंट पर जोर दिया जा रहा है। इसका मकसद इंडस्ट्रियल कैपेसिटी को बढ़ाना और ग्लोबल मार्केट की अस्थिरता के बीच सप्लाई चेन को सुरक्षित करना है। भारत अपनी निर्भरता को कम करने के लिए रिन्यूएबल कंपोनेंट्स का प्रोडक्शन स्थानीय स्तर पर करने पर जोर दे रहा है।
प्राइवेट सेक्टर की भूमिका
ऑस्ट्रेलियाई क्लाइमेट मिनिस्टर क्रिस बोवेन और भारतीय नीति-निर्माताओं के बीच हुई चर्चा में एनर्जी सिक्योरिटी पर खास जोर दिया गया। इसमें Reliance Industries जैसे बड़े उद्योगपतियों ने भी हिस्सा लिया, जो पहले से ही अपने सोलर मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन एनर्जी इकोसिस्टम में बड़ा निवेश कर रहे हैं।
कोयले पर संतुलित रुख
ऑस्ट्रेलिया ने यह स्पष्ट किया है कि ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन के बीच कोयले का व्यापार अभी भी उनकी ऊर्जा जरूरतों का एक जरूरी हिस्सा बना रहेगा। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि कैसे पारंपरिक ऊर्जा और क्लीन एनर्जी के बीच यह संतुलन ग्लोबल ट्रेड की दिशा तय करेगा। आने वाले समय में COP31 समिट में क्लाइमेट फाइनेंस पर होने वाली चर्चा और इस ट्रेनिंग सेंटर का कामकाज रिन्यूएबल सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण इंडिकेटर साबित होगा।
