Union Cabinet ने एनर्जी स्टोरेज के लिए ₹14,500 करोड़ की 'वायबिलिटी गैप फंडिंग' को मंजूरी दे दी है। इस कदम से 2031 तक 92 GWh की ग्रिड-स्केल स्टोरेज क्षमता तैयार की जाएगी, जो रिन्यूएबल एनर्जी की अस्थिरता को मैनेज करने में मदद करेगी।
सरकार की नई पहल
केंद्र सरकार ने रिन्यूएबल एनर्जी के मोर्चे पर एक बड़ा फैसला लिया है। ₹14,500 करोड़ की यह फंड स्कीम 2027 से 2031 के बीच लागू की जाएगी। इसका सीधा मकसद पावर ग्रिड को मजबूत बनाना है ताकि हवा और सौर ऊर्जा से मिलने वाली बिजली की अस्थिर सप्लाई को बेहतर तरीके से संभाला जा सके।
स्टोरेज का गणित
इस ₹97,600 करोड़ के कुल प्रोजेक्ट का खाका कुछ इस तरह है:
- 60 GWh: हाइड्रो पंप्ड स्टोरेज प्लांट्स (Hydro Pumped Storage) के लिए।
- 30 GWh: बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) के लिए।
- 2 GWh: अन्य नई टेक्नोलॉजी के लिए।
लोकल मैन्युफैक्चरिंग पर जोर
सरकार ने 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा देने के लिए बैटरी प्रोजेक्ट्स में 40% डोमेस्टिक कंटेंट की अनिवार्यता रखी है। इसका मतलब है कि बैटरी बनाने के लिए जरूरी सामान और पार्ट्स का एक बड़ा हिस्सा भारत में ही तैयार होना चाहिए। हालांकि, यह कदम स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए मौका है, लेकिन कंपनियों को कच्चा माल जुटाने के लिए अभी भी ग्लोबल सप्लाई चेन पर निर्भर रहना होगा।
निवेशकों के लिए चेतावनी और अवसर
इंफ्रास्ट्रक्चर और EPC कंपनियों के लिए यह एक बड़ा पाइपलाइन प्रोजेक्ट साबित हो सकता है। हालांकि, निवेशकों को याद रखना चाहिए कि हाइड्रो पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स काफी लंबे समय (लगभग 5 से 8 साल) में पूरे होते हैं। इसलिए, इन प्रोजेक्ट्स से मुनाफे की उम्मीद तुरंत करना जल्दबाजी होगी। भविष्य में कंपनियों के ऑर्डर बुक और सरकारी टेंडर्स की गति पर नजर रखना मुनाफे के लिए जरूरी होगा।
