Ministry of Power ने रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के लिए बड़ा ऐलान किया है। अब कंपनियां Battery Energy Storage Systems (BESS) के जरिए अपनी बची हुई या 'curtailed' बिजली को स्टोर करके बेच सकेंगी, जिससे उनकी कमाई का एक नया जरिया खुलेगा।
बिजली की बर्बादी पर लगेगा लगाम
Ministry of Power ने 27 अगस्त, 2026 से प्रभावी एक नया निर्देश जारी किया है। अब रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर्स co-located BESS का उपयोग करके उस बिजली को स्टोर कर पाएंगे, जो ग्रिड में जगह न होने के कारण अक्सर बर्बाद हो जाती थी। भारत के उत्तरी क्षेत्रों में ग्रिड की बाधाओं के कारण अक्सर बिजली का प्रोडक्शन तो होता था, लेकिन उसे ग्रिड लेने से इनकार कर देता था, जिससे कंपनियों को भारी नुकसान होता था।
पुराने नियमों (PPA) के तहत कंपनियां अपनी इस सरप्लस बिजली को किसी तीसरे पक्ष को नहीं बेच सकती थीं। लेकिन अब, सरकार ने इन BESS संपत्तियों को एक स्वतंत्र ऑपरेशन के रूप में वर्गीकृत किया है, जिससे डेवलपर्स इसे पावर एक्सचेंज पर बेच पाएंगे।
कंपनियों के लिए क्या है मौका?
NTPC, Tata Power, और JSW Energy जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए यह गेम-चेंजर साबित हो सकता है। इससे न केवल उनकी एसेट यूटिलाइजेशन बेहतर होगी, बल्कि प्रोजेक्ट रिटर्न में भी सुधार की उम्मीद है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां और रिस्क
हालांकि यह पॉलिसी कमाई का नया रास्ता खोलती है, लेकिन इसके साथ कुछ रिस्क भी जुड़े हैं:
- कैपिटल खर्च (Capex): BESS यूनिट्स को सेटअप करने में भारी निवेश की जरूरत है, जिससे कंपनियों पर कर्ज का बोझ बढ़ सकता है।
- मार्केट वोलैटिलिटी: पावर एक्सचेंज पर कीमतें डिमांड और सप्लाई के हिसाब से बदलती रहती हैं। अगर स्टोरेज की लागत मार्केट प्राइस से ज्यादा हुई, तो यह सौदा घाटे का हो सकता है।
- लागत का दबाव: सोलर और बैटरी कंपोनेंट्स की कीमतों में 20% से 25% तक की बढ़ोतरी कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन को प्रभावित कर सकती है।
निवेशकों को अब यह देखना होगा कि कौन सी कंपनियां अपनी बैलेंस शीट को मजबूत रखते हुए इन प्रोजेक्ट्स को तेजी से लागू कर पाती हैं। कंपनी मैनेजमेंट की ओर से आने वाली अपडेट्स और बैटरी कंपोनेंट्स की कीमतों पर नजर रखना अब बेहद जरूरी होगा।
