भारत सरकार ने ओडिशा और कर्नाटक में अपने फेज-2 स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व प्रोजेक्ट्स को रफ्तार दे दी है। इस कदम का मकसद क्रूड ऑयल की कीमतों के उतार-चढ़ाव से बचना और देश की एनर्जी सप्लाई को सुरक्षित करना है।
भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक बड़ा कदम उठा रहा है। सरकार अब फेज-2 एक्सपेंशन पर जोर दे रही है, जिसमें ओडिशा के चांदीखोल और कर्नाटक के पादुर में बड़े स्टोरेज हब बनाए जाएंगे। देश अपनी जरूरत का लगभग 87% क्रूड ऑयल आयात करता है, ऐसे में 6.5 मिलियन टन की अतिरिक्त कैपेसिटी उसे ग्लोबल सप्लाई शॉक से बचाने में मदद करेगी।
ओडिशा और कर्नाटक में विस्तार
चांदीखोल प्रोजेक्ट काफी समय से चर्चा में था, जिसे अब 400 एकड़ जमीन मिलने के बाद गति मिली है। सरकार यहां अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी जैसे अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ बातचीत कर रही है। साथ ही, ओएनजीसी (ONGC) मैंगलोर में 1.75 मिलियन टन की फैसिलिटी पर काम कर रही है। सरकार बीना और बीकानेर में भी नए हब बनाने की संभावना तलाश रही है, जहां क्रूड ऑयल, एलएनजी (LNG) और एलपीजी (LPG) स्टोर की जा सकेगी।
लागत कम करने की रणनीति
अभी पर्याप्त स्टोरेज न होने के कारण आपात स्थिति में हमें महंगे स्पॉट रेट पर तेल खरीदना पड़ता है। इस ₹15,000 करोड़ के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य तेल को कम कीमत पर खरीदकर स्टोर करना है। इसके लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल और वायबिलिटी गैप फंडिंग का सहारा लिया जा रहा है ताकि प्राइवेट इन्वेस्टर्स को आकर्षित किया जा सके।
क्या हैं चुनौतियां?
इन्वेस्टर्स को यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत में बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट्स अक्सर जमीन अधिग्रहण और प्रशासनिक बाधाओं के कारण देरी का शिकार होते हैं। चांदीखोल प्रोजेक्ट का ट्रैक रिकॉर्ड भी इसका गवाह है, जहां बीते 8 वर्षों में काम धीमा रहा है। लॉन्ग टर्म में प्रोजेक्ट की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कितनी तेजी से काम पूरा करती है और प्राइवेट पार्टनरशिप कितनी प्रभावी रहती है।
