IWTMA की मांग: विंड एनर्जी लक्ष्य के लिए ग्रिड प्लानिंग में बड़े बदलाव की ज़रूरत

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AuthorMehul Desai|Published at:
IWTMA की मांग: विंड एनर्जी लक्ष्य के लिए ग्रिड प्लानिंग में बड़े बदलाव की ज़रूरत

इंडियन विंड टर्बाइन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IWTMA) ने चेताया है कि ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर में देरी भारत के 100 GW विंड एनर्जी के लक्ष्य को रोक सकती है। निवेशकों के लिए, ट्रांसमिशन और ज़मीन अधिग्रहण में ये बाधाएं ऑपरेशनल जोखिम पैदा कर सकती हैं, जिससे रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के प्रोजेक्ट शुरू होने और रेवेन्यू मिलने में देरी हो सकती है।

ग्रिड प्लानिंग पर IWTMA की गंभीर चिंता

इंडियन विंड टर्बाइन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IWTMA) ने देश के पावर ट्रांसमिशन नेटवर्क की प्लानिंग में बड़े बदलाव की मांग की है। भारत 2030 तक 100 गीगावाट (GW) विंड एनर्जी क्षमता के लक्ष्य को हासिल करने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन IWTMA का कहना है कि ग्रिड कंस्ट्रक्शन और ज़मीन अधिग्रहण की वर्तमान गति, डेवलपर्स की प्रोजेक्ट बनाने की तेज़ी से मेल नहीं खा रही है।

रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद संरचनात्मक बाधाएं

फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में भारत ने विंड पावर कैपेसिटी में रिकॉर्ड 6.1 GW की बढ़ोतरी देखी, जिससे कुल क्षमता 56 GW से ज़्यादा हो गई। लेकिन IWTMA आगाह कर रहा है कि भविष्य की वृद्धि संरचनात्मक बाधाओं का सामना कर रही है। एसोसिएशन का सुझाव है कि राज्यों को मल्टी-ईयर ट्रांसमिशन प्लानिंग यानी रोलिंग ट्रांसमिशन प्लान की ओर बढ़ना चाहिए। ये प्लान नियमित रूप से अपडेट हों और सीधे रिन्यूएबल एनर्जी के अनुमानित विस्तार से जुड़े हों। इससे यह सुनिश्चित होगा कि जैसे ही कोई विंड फार्म तैयार हो, ग्रिड बिजली ले जाने के लिए तैयार रहे।

निवेशकों के लिए ऑपरेशनल जोखिम (Operational Risks)

रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर के निवेशकों, जिसमें विंड टर्बाइन निर्माता और प्रोजेक्ट डेवलपर्स शामिल हैं, के लिए ये इंफ्रास्ट्रक्चर चुनौतियां निगरानी के लिए महत्वपूर्ण हैं। एनर्जी सेक्टर में "एग्जीक्यूशन रिस्क" (Execution Risk) तब पैदा होता है जब कोई प्रोजेक्ट बनकर तैयार तो हो जाता है, लेकिन ट्रांसमिशन लाइन या सबस्टेशन तैयार न होने के कारण ग्रिड से कनेक्ट नहीं हो पाता। ऐसी देरी होने पर, कंपनियों की रेवेन्यू रिकॉग्नाइज़ करने की क्षमता पर सीधा असर पड़ सकता है, क्योंकि कनेक्शन चालू होने तक वे बिजली नहीं बेच सकते।

प्रोजेक्ट टाइमलाइन में बाधाएं

इंडस्ट्री की रिपोर्ट कई ऐसी बाधाओं को उजागर करती है जो प्रोजेक्ट की टाइमलाइन को जटिल बनाती हैं। ट्रांसमिशन लाइनों के लिए ज़मीन हासिल करने में देरी (जिसे अक्सर "राइट ऑफ वे" (Right of Way) इश्यूज कहा जाता है) और पावर सेल एग्रीमेंट (Power Sale Agreements) - जो जेनरेटर और राज्य-संचालित वितरण कंपनियों (DISCOMs) के बीच कॉन्ट्रैक्ट होते हैं - की धीमी प्रोसेसिंग, बड़ी समस्याएं बनी हुई हैं। इसके अलावा, DISCOMs की वित्तीय सेहत भी चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि भुगतान में देरी नए विंड प्रोजेक्ट्स की बैंक-एबिलिटी (Bankability) को प्रभावित कर सकती है।

बेहतर प्लानिंग के उदाहरण

कुछ राज्य पहले से ही दिखा रहे हैं कि इन प्रक्रियाओं में कैसे सुधार किया जा सकता है। गुजरात और महाराष्ट्र का ज़िक्र उदाहरण के तौर पर किया गया है, जिन्होंने बेहतर प्लानिंग फ्रेमवर्क लागू करना शुरू कर दिया है। इनमें ज़मीन और ट्रांसमिशन अप्रूवल के लिए डेडिकेटेड ऑनलाइन पोर्टल और कनेक्टिविटी देने के लिए स्पष्ट समय-सीमाएं शामिल हैं। IWTMA का तर्क है कि इन अभ्यासों को व्यापक रूप से अपनाने से निर्माताओं और डेवलपर्स के लिए एक अधिक अनुमानित माहौल बनाने में मदद मिलेगी।

भविष्य की राह

निवेशकों को यह देखना चाहिए कि सरकार इन ट्रांसमिशन और ज़मीन संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए अपनी पॉलिसी कैसे विकसित करती है। विंड एनर्जी के विस्तार पर ज़ोर मजबूत है, जो घरेलू मांग में वृद्धि और टर्बाइन निर्यात को बढ़ावा दे रहा है - पिछले फाइनेंशियल ईयर में निर्यात ₹12,000 करोड़ के पार चला गया था। हालांकि, इस वृद्धि का वास्तविक कंपनी आय में कितना अनुवाद होगा, यह इस बात पर काफी हद तक निर्भर करेगा कि सहायक ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर समय पर बन पाता है या नहीं, ताकि नई ऊर्जा आपूर्ति को समाहित किया जा सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.