सर्टिफिकेशन से सप्लाई तक का सफर
यह सर्टिफिकेशन एक बड़ा प्रोसेस पूरा होने का संकेत है, लेकिन IOC की असली परीक्षा तो इस ग्रीन फ्यूल को बनाने के लिए जरूरी यूज्ड कुकिंग ऑयल (UCO) को जुटाने की लॉजिस्टिक और सप्लाई की चुनौतियों से निपटना ही होगी।
निवेशक क्या सोच रहे हैं?
इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) के शेयर इस समय ₹170-₹180 के दायरे में ट्रेड कर रहे हैं, जिनका प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेश्यो लगभग 11x है। कंपनी का मार्केट कैप करीब ₹1.6 लाख करोड़ है। SAF सर्टिफिकेशन की घोषणा का स्टॉक पर सीधा असर फिलहाल सीमित दिख रहा है। ऐसा लगता है कि निवेशक SAF की लॉन्ग-टर्म संभावनाओं को कंपनी के मौजूदा रिफाइनिंग मार्जिन और ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसे तात्कालिक फैक्टर्स के साथ तौल रहे हैं। सालाना 35,000 टन SAF उत्पादन का लक्ष्य एक शुरुआत है, लेकिन यह भारत के महत्वाकांक्षी ब्लेंडिंग टारगेट्स को पूरा करने के लिए जरूरी कुल फ्यूल का एक छोटा सा हिस्सा है।
एनालिटिकल डीप डाइव: चुनौती और संभावनाएँ
IOC की यह उपलब्धि पानीपत रिफाइनरी में SAF प्रोडक्शन सर्टिफिकेशन के मामले में भारत के लिए पहली है। कंपनी का फोकस यूज्ड कुकिंग ऑयल (UCO) को प्राइमरी फीडस्टॉक के तौर पर इस्तेमाल करने पर है। यह रणनीति राष्ट्रीय लेवल पर वेस्ट मटेरियल (कचरे) का उपयोग करने और मौजूदा रिफाइनरी इंफ्रास्ट्रक्चर में को-प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के अनुरूप है, जिससे कैपिटल एक्सपेंडिचर कम होता है। हालांकि, यह स्ट्रैटेजी UCO की लगातार उपलब्धता पर बहुत अधिक निर्भर करती है। IOC के कॉम्पिटिटर जैसे भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) भी SAF पर काम कर रहे हैं, लेकिन UCO-आधारित प्रोडक्शन के लिए अभी तक कोई भी इस सर्टिफिकेशन लेवल तक नहीं पहुंचा है। वहीं, Neste जैसी ग्लोबल लीडर्स ने SAF को स्केल करने में सफलता पाई है, लेकिन वे अक्सर म्युनिसिपल वेस्ट और एग्रीकल्चरल रेसिड्यू जैसे फीडस्टॉक की एक विस्तृत रेंज का उपयोग करते हैं।
IOC और भारत के समग्र SAF एंबीशन्स के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या घरेलू UCO सप्लाई चेन पर्याप्त और भरोसेमंद है। अभी के अनुमान बताते हैं कि इसमें कमी आ सकती है, जो सरकार के 2030 तक अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में 5% SAF ब्लेंडिंग और 2040 तक घरेलू उड़ानों में 15% ब्लेंडिंग के टारगेट को पूरा करने में एक बड़ी बाधा बन सकता है। ऐतिहासिक रूप से, IOC के स्टॉक की परफॉरमेंस रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स की खबरों की बजाय व्यापक एनर्जी मार्केट ट्रेंड्स से अधिक जुड़ी रही है। एनालिस्ट्स की राय SAF को डीकार्बोनाइजेशन के लिए रणनीतिक रूप से आवश्यक मानती है, लेकिन फीडस्टॉक की सुरक्षा और कन्वेंशनल जेट फ्यूल की तुलना में SAF की इकोनॉमिक कॉम्पिटिटिवनेस को लेकर चिंताएं भी बनी हुई हैं।
भविष्य की राह
भले ही यह सर्टिफिकेशन एक पॉजिटिव रेगुलेटरी और टेक्निकल कदम है, भारत के SAF प्रोग्राम की स्केलेबिलिटी मजबूत फीडस्टॉक प्रोक्योरमेंट और सप्लाई चेन डेवलपमेंट पर टिकी है। सरकारी इंसेंटिव्स, स्पष्ट पॉलिसी फ्रेमवर्क्स और कलेक्शन इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश, UCO की एक स्थिर और किफायती सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण होंगे। इस मूल चुनौती का समाधान किए बिना, प्रोडक्शन सर्टिफिकेशन चाहे कुछ भी हों, निर्धारित समय-सीमा के भीतर देश के मैंडेटेड ब्लेंडिंग परसेंटेजेस को हासिल करना एक बड़ा हर्डल बना रहेगा।