IIT Madras के शोधकर्ताओं ने एक नया 'रीकॉन्फिगरेबल पावर कन्वर्जन सिस्टम' विकसित किया है। यह इनोवेशन ग्रीन हाइड्रोजन प्रोडक्शन में आने वाली दिक्कतों को कम करने में मदद करेगा, हालांकि अभी यह एक शुरुआती लैबोरेटरी प्रोटोटाइप है।
पावर मैनेजमेंट में नया बदलाव
डॉ. दीपक रोनांकी के नेतृत्व में टीम ने एक ऐसी प्रेडिक्टिव कंट्रोल स्ट्रैटेजी पर काम किया है, जो सिस्टम को जरूरत के हिसाब से अलग-अलग कन्वर्टर चैनलों को ऑन या ऑफ करने की सुविधा देती है। यह डिज़ाइन बड़े पैमाने पर चल रहे ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स में पावर सप्लाई के उतार-चढ़ाव को संभालने में सक्षम है। इस सिस्टम की एक खास बात यह है कि इसमें 'फॉल्ट-टोलरेंस' फीचर है, यानी कुछ कन्वर्टर चैनलों के फेल होने के बावजूद यह काम करना जारी रखता है। इससे इंडस्ट्रियल डाउनटाइम को कम किया जा सकेगा।
कमर्शियल स्केल पर चुनौतियां
फिलहाल यह सिस्टम 5 kVA का एक लैबोरेटरी प्रोटोटाइप है। लैब से निकलकर मेगावाट-स्केल की इंडस्ट्री तक पहुंचना एक बड़ा सफर है। इसमें थर्मल लोड को मैनेज करना और ग्रिड की क्वालिटी बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, ग्रीन हाइड्रोजन की लागत अभी भी 'ग्रे' हाइड्रोजन के मुकाबले काफी ज्यादा है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
ग्रीन हाइड्रोजन सेक्टर के लिए कच्चा माल, जैसे प्लैटिनम और इरिडियम, आज भी आयात पर निर्भर है, जो लागत को बढ़ाता है। भविष्य में इस तकनीक की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे बिना किसी बड़ी मेंटेनेंस कॉस्ट के कैसे स्केल किया जा सकता है। यह इनोवेशन भारत के ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के लिए एक सकारात्मक कदम है, लेकिन कमर्शियल वायबिलिटी के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
