ग्रीन मॉलिक्यूल इकोनॉमी को बड़ी उड़ान
Hygenco में $105 मिलियन का निवेश भारत के लिए एक बड़ी स्ट्रेटेजिक चाल है। यह फंड देश को जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करके ग्रीन हाइड्रोजन हब बनाने में मदद करेगा। इस फंडिंग राउंड में इंटरनेशनल फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IFC) ने सबसे बड़ा योगदान दिया है, जिसमें Siemens Financial Services और कई सस्टेनेबिलिटी-केंद्रित फंड्स भी शामिल हैं। इस पैसे से Hygenco अपने पायलट प्रोजेक्ट्स से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर पाएगा। Hygenco भारत का पहला कमर्शियल ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट चला चुकी है। अब कंपनी स्टील, रिफाइनरी और फर्टिलाइजर जैसे इंडस्ट्रीज को ग्रीन हाइड्रोजन सप्लाई करेगी, जो अभी तक महंगे और ज्यादा प्रदूषण वाले ग्रे हाइड्रोजन का इस्तेमाल करते हैं।
'गैस-एज़-ए-सर्विस' मॉडल की खासियत
दूसरे EPC (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट, कंस्ट्रक्शन) कंपनियों के विपरीत, जो सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स पर निर्भर करती हैं, Hygenco 'गैस-एज़-ए-सर्विस' मॉडल पर काम करती है। इस मॉडल के तहत, इंडस्ट्रियल ग्राहक इलेक्ट्रोलाइजर इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी शुरुआती निवेश किए बिना ग्रीन हाइड्रोजन अपना सकते हैं। Hygenco खुद प्रोडक्शन एसेट्स की मालिक होगी और उन्हें ऑपरेट करेगी, जिससे ऑफटेक रिस्क कम होगा। हालांकि Reliance और Adani जैसी बड़ी कंपनियां बड़े पैमाने पर कैपेसिटी की घोषणा कर रही हैं, Hygenco का फोकस छोटे, साइट-स्पेसिफिक डिलीवरी पर है, जो इंडस्ट्रीज को तुरंत डीकार्बोनाइजेशन में मदद कर सकता है।
बाज़ार की असलियत और स्ट्रक्चरल रिस्क
इस सेक्टर में एक बड़ी चुनौती यह है कि घोषित कैपेसिटी की तुलना में डिमांड बहुत कम है। 2026 की शुरुआत तक, भारत में ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स का एक बड़ा हिस्सा अभी तक शुरू नहीं हो पाया है, जिसका मुख्य कारण हाइड्रोजन खरीद के लिए मजबूत मैकेनिज्म का अभाव है। Hygenco के लिए सबसे बड़ा रिस्क ग्रीन हाइड्रोजन की डिलीवरी कॉस्ट है। इसे ग्रे हाइड्रोजन के बराबर लाना (जो आमतौर पर $2.30 से $2.50 प्रति किलो होता है) बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए ज़रूरी है। इसके अलावा, सोलर और विंड जैसे इंटरमिटेंट रिन्यूएबल एनर्जी सोर्स पर निर्भरता के कारण स्टोरेज या ग्रिड-बैलेंसिंग सॉल्यूशंस की ज़रूरत पड़ती है, जो लागत बढ़ाते हैं। कंपनी ने ग्रीन अमोनिया के लिए टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप भी की है, लेकिन इसकी सफलता ग्लोबल सर्टिफिकेशन और दूसरे देशों के मुकाबले लागत-प्रतिस्पर्धा पर निर्भर करेगी।
आगे की रणनीति
भविष्य में, इस निवेश की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि Hygenco अपने डेवलपमेंट पाइपलाइन को एक्टिव, हाई-यूटिलाइजेशन एसेट्स में कितना बदल पाती है। कंपनी अगले कुछ सालों में अरबों का निवेश करने की योजना बना रही है और भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का फायदा उठाने के लिए तैयार है। हालांकि, इंडस्ट्री में प्रोडक्शन कॉस्ट से ज़्यादा डिलीवर्ड कॉस्ट पर ज़ोर दिया जा रहा है। जिन कंपनियों के पास पानी की उपलब्धता और ट्रांसमिशन कनेक्टिविटी की अच्छी व्यवस्था होगी, वे आगे रहेंगी। इन्वेस्टर्स Hygenco की 2027 और 2028 की फेज-वन कैपेसिटी टारगेट्स पर नज़र रखेंगे, ताकि पता चल सके कि 'गैस-एज़-ए-सर्विस' मॉडल बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच मुनाफा कमा सकता है या नहीं।
