गल्फ देशों में चल रहे तनाव के बीच तेल की सप्लाई बनाए रखने के लिए अब शिप-टू-शिप ट्रांसफर का सहारा लिया जा रहा है। ओमान के पास हो रही इस महंगी प्रक्रिया से कच्चे तेल की शिपिंग लागत बढ़कर कुल वैल्यू का **25%** तक पहुंच गई है, जिससे भारत का ऑयल इंपोर्ट बिल सीधे प्रभावित हो सकता है।
गल्फ देशों के प्रोड्यूसर्स ने अब एक नई लॉजिस्टिक्स रणनीति अपनाई है। संकटग्रस्त इलाकों से बचने के लिए ओमान के तट पर 'शिप-टू-शिप ट्रांसफर' का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें बड़े टैंकरों को एक-दूसरे से जोड़कर तेल को दूसरी जहाजों में शिफ्ट किया जाता है। हालांकि यह सप्लाई चैन को चालू रखने का एक जरिया है, लेकिन इसने तेल आयात करने वाले देशों के लिए आर्थिक बोझ बढ़ा दिया है।
लागत में बड़ा उछाल
तनाव से पहले शिपिंग का खर्च कच्चे तेल की कुल कीमत का महज 2% से 3% ही हुआ करता था, जो अब बढ़कर 25% तक पहुंच गया है। यानी अब तेल के लिए खर्च किए जाने वाले पैसे का एक बड़ा हिस्सा तेल की कीमत के बजाय सिर्फ मालभाड़े और ट्रांजिट फीस में जा रहा है।
भारत और सरकारी कंपनियों पर असर
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 85% से ज्यादा आयात करता है। ऐसे में 'लैंडेड कॉस्ट' (तेल की कीमत + भाड़ा + बीमा) बढ़ने से देश के करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit) पर दबाव बढ़ना तय है।
वहीं, सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) जैसे Indian Oil Corporation (IOC), Bharat Petroleum (BPCL) और Hindustan Petroleum (HPCL) के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। अगर इन कंपनियों को बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर नहीं डालने दिया गया, तो इनके प्रॉफिट मार्जिन पर सीधा असर पड़ेगा। हालांकि, ONGC और Oil India जैसी घरेलू कंपनियां, जो देश के अंदर तेल उत्पादन करती हैं, वे इस वैश्विक शिपिंग संकट से अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं, लेकिन उनके मुनाफे भी ग्लोबल क्रूड प्राइसेज से जुड़े हुए हैं।
निवेशकों को अब कंपनियों के आने वाले तिमाही नतीजों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए कि कैसे इन बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागतों का असर उनकी बैलेंस शीट पर पड़ रहा है।
