Strait of Hormuz में बढ़ते तनाव के चलते गल्फ देशों ने तेल के लिए महंगे रास्तों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। इससे शिपिंग प्रीमियम में **$26 प्रति बैरल** की बढ़ोतरी हुई है, जो भारतीय ऑयल कंपनियों के मार्जिन पर सीधा असर डाल सकती है।
बढ़ रही है लॉजिस्टिक चुनौती
ग्लोबल एनर्जी मार्केट इस समय एक गंभीर लॉजिस्टिक संकट से जूझ रहा है। Strait of Hormuz में जारी तनाव के कारण Saudi Arabia और UAE ने अपने तेल निर्यात के लिए पारंपरिक रास्तों को छोड़कर East-West Pipeline और Fujairah पोर्ट जैसे वैकल्पिक इंफ्रास्ट्रक्चर का रुख किया है।
हालांकि, इस बदलाव की कीमत बहुत ज्यादा है। टैंकर चार्टर रेट्स बढ़कर $1 मिलियन प्रति दिन तक पहुंच गए हैं, जिससे कच्चे तेल की लागत में $26 प्रति बैरल का प्रीमियम जुड़ गया है। फिलहाल ग्लोबल मार्केट इस लागत को झेल रहा है, लेकिन यह लंबे समय तक जारी रहने पर चिंता का विषय बना हुआ है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। लागत बढ़ने से Indian Oil Corporation (IOC), Bharat Petroleum (BPCL) और Hindustan Petroleum (HPCL) जैसी Oil Marketing Companies (OMCs) के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा, कच्चा तेल महंगा रहने से देश का ट्रेड डेफिसिट और महंगाई दर (Retail Inflation) दोनों प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि एनर्जी कॉस्ट हमारी इकॉनमी का एक बड़ा हिस्सा है।
नाजुक संतुलन
फिलहाल, मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें $85 से $90 प्रति बैरल के दायरे में बनी हुई हैं। यह संतुलन पूरी तरह से इन्वेंट्री और वैकल्पिक रास्तों पर टिका है, जो कि पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। किसी भी और भू-राजनीतिक तनाव या सप्लाई में रुकावट से कीमतों में और तेजी आने का जोखिम बना हुआ है। निवेशकों को आने वाले समय में रिफाइनरी मार्जिन और क्रूड प्राइस ट्रेंड पर पैनी नजर रखने की जरूरत है।
