गुजरात का बड़ा दांव: ₹500 करोड़ में पावर ग्रिड को बनाया जाएगा अंडरग्राउंड!

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AuthorMehul Desai|Published at:
गुजरात का बड़ा दांव: ₹500 करोड़ में पावर ग्रिड को बनाया जाएगा अंडरग्राउंड!
Overview

गुजरात सरकार ने 'वायर-फ्री सिटी मिशन' के तहत साल 2030 तक **46,000** सर्किट किलोमीटर की पावर लाइनों को अंडरग्राउंड करने का ऐलान किया है। इस मिशन के लिए शुरुआती बजट **₹500 करोड़** रखा गया है, लेकिन इसकी भारी पूंजीगत लागत पर सवाल भी उठ रहे हैं।

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इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव

गुजरात सरकार के 'वायर-फ्री सिटी मिशन' को मंजूरी मिलने से शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। इस मिशन के तहत राज्य की 17 म्युनिसिपल कॉरपोरेशनों और 151 नगर पालिकाओं में 46,000 सर्किट किलोमीटर लंबी ओवरहेड बिजली लाइनों को अंडरग्राउंड नेटवर्क में बदला जाएगा। इसका मकसद शहरों को न सिर्फ दिखने में बेहतर बनाना है, बल्कि तूफानों जैसी आपदाओं से पावर ग्रिड की सुरक्षा को भी मजबूत करना है।

सुरक्षा की कीमत

शुरुआती ₹500 करोड़ का बजट एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स का मानना है कि अंडरग्राउंडिंग का काम काफी महंगा होता है। भारत में ऐसे ही प्रोजेक्ट्स, जैसे हैदराबाद का ₹4,051 करोड़ या तेलंगाना का ₹13,500 करोड़ का प्रोजेक्ट, को देखें तो गुजरात का यह बजट एक बड़ी, मल्टी-ईयर फाइनेंशियल कमिटमेंट का महज़ एक छोटा हिस्सा लगता है। सरकार की योजना पहले 11 kV की हाई-टेंशन लाइनों को अंडरग्राउंड करने की है, जिसके बाद लो-टेंशन डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पर काम होगा। इससे वित्तीय दबाव को कम करते हुए ग्रिड की स्थिरता पर ध्यान दिया जा सकेगा। हालांकि, लंबे समय में टेक्निकल लॉस कम होने और मेंटेनेंस कॉस्ट घटने से शुरुआती भारी खर्च की भरपाई होने की उम्मीद है।

जोखिम और चुनौतियां

जोखिम की नजर से देखें तो इस मिशन को लागू करने में कई बड़ी चुनौतियां हैं। अंडरग्राउंडिंग के काम में 'राइट-ऑफ-वे' (सड़क या जमीन इस्तेमाल करने का अधिकार) की दिक्कतें और जमीन के नीचे पहले से मौजूद अन्य यूटिलिटीज (जैसे पानी, गैस पाइपलाइन) के कारण प्रोजेक्ट में देरी और खर्च बढ़ने की आशंका रहती है। ओवरहेड लाइनों के विपरीत, अंडरग्राउंड सिस्टम में खराबी का पता लगाना और उसे ठीक करना मुश्किल होता है, जिसके लिए सटीक मैपिंग और खास रख-रखाव की ज़रूरत पड़ती है। एक और जोखिम यह है कि कहीं यह टेक्नोलॉजी भविष्य में पुरानी न हो जाए; अगर इंटीग्रेटेड यूटिलिटी कॉरिडोर नहीं बनाए गए, तो भविष्य में क्षमता बढ़ाने के लिए फिर से खुदाई करनी पड़ सकती है, जो महंगा सौदा होगा। इसके अलावा, घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में सरकारी प्रोजेक्ट से ट्रैफिक और व्यावसायिक गतिविधियों में बड़ी रुकावट आ सकती है, जो पहले भी ऐसे कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में देखने को मिल चुका है।

आगे की राह

भविष्य में इस मिशन की सफलता काफी हद तक टॉप-टियर EPC (इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन) कंपनियों पर निर्भर करेगी, जो बड़े पैमाने पर केबल इंस्टॉलेशन और ट्रेंचिंग का काम संभाल सकें। जैसे-जैसे राज्य सरकार विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) और टेंडरिंग की ओर बढ़ेगी, वैसे-वैसे हाई-ग्रेड फ्लेम-रिटार्डेंट और आर्मर्ड केबलिंग की खरीद पर बाजार की नजर रहेगी। अगर यह प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक लागू होता है, तो यह न केवल नेशनल स्मार्ट सिटी मानकों के अनुरूप होगा, बल्कि गुजरात को पावर सप्लाई में आने वाली रुकावटों (SAIDI स्कोर) को काफी कम करने में मदद करेगा, जिससे दशक के अंत तक यह क्षेत्र के लिए बिजली की विश्वसनीयता का एक नया बेंचमार्क स्थापित कर सकेगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.