ग्रीन हाइड्रोजन की लागत, ग्रे फ्यूल से दोगुनी! भारत में क्यों आ रही है दिक्कत?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
ग्रीन हाइड्रोजन की लागत, ग्रे फ्यूल से दोगुनी! भारत में क्यों आ रही है दिक्कत?

भारत एनर्जी सिक्योरिटी (Energy Security) बढ़ाने के लिए ग्रीन हाइड्रोजन पर जोर दे रहा है, लेकिन इसकी प्रोडक्शन कॉस्ट (Production Cost) अभी भी ₹279 प्रति किलो के आसपास है, जबकि पारंपरिक ग्रे हाइड्रोजन की लागत ₹150-200 प्रति किलो है। इस सेक्टर की ग्रोथ रिन्यूएबल पावर (Renewable Power) को बढ़ाने और टेक्नोलॉजी की लागत कम करने पर निर्भर करती है।

प्रोडक्शन में आर्थिक अंतर

नेचुरल गैस से बनने वाला ग्रे हाइड्रोजन अभी ₹150 से ₹200 प्रति किलो की कीमत पर सस्ता पड़ रहा है। इसके मुकाबले, भारत में ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत लगभग ₹279 प्रति किलो पाई गई है। इस बड़े अंतर की मुख्य वजह इलेक्ट्रोलाइजर्स (Electrolyzers) का भारी बिजली कंजप्शन है। ये मशीनें एक किलो हाइड्रोजन बनाने में करीब 50 यूनिट बिजली इस्तेमाल करती हैं। इसके अलावा, पानी की ट्रीटमेंट, स्टोरेज और इलेक्ट्रोलाइजर जैसे महंगे इक्विपमेंट की वजह से ग्रीन हाइड्रोजन का प्रोडक्शन और भी महंगा हो जाता है।

रिन्यूएबल पावर और मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाना होगा

इस लागत के अंतर को पाटने के लिए भारत को सोलर (Solar) और विंड एनर्जी (Wind Energy) का बड़े पैमाने पर विस्तार करना होगा। अनुमान है कि कॉम्पिटिटिव प्राइसिंग (Competitive Pricing) तक पहुंचने के लिए हर साल 50 GW से ज्यादा रिन्यूएबल कैपेसिटी (Renewable Capacity) जोड़ने की जरूरत होगी, साथ ही पावर स्टोरेज (Power Storage) और ट्रांसमिशन नेटवर्क (Transmission Network) में भारी निवेश करना होगा। कंपनियां इस चुनौती से निपटने के लिए लोकलाइजेशन (Localization) पर ध्यान दे रही हैं। उदाहरण के लिए, लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने अपने ग्रीन हाइड्रोजन बिजनेस के लिए ₹15,000 करोड़ का निवेश किया है, जिसमें हाज़िरा (Hazira) में 400 MW की क्षमता वाले प्लांट में इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग को लोकल बनाना भी शामिल है, ताकि इंपोर्टेड टेक्नोलॉजी पर निर्भरता कम हो सके।

डिमांड के सोर्स और मार्केट पोटेंशियल

घरेलू मांग (Domestic Demand) मुख्य रूप से रिफाइनरी (Refineries) और फर्टिलाइजर प्लांट्स (Fertilizer Plants) से आने की उम्मीद है, जो पहले से ही काफी हाइड्रोजन इस्तेमाल करते हैं। ये इंडस्ट्रीज अपने ऑपरेशन्स में ग्रीन हाइड्रोजन को शामिल करने के लिए सरकारी टेंडर्स (Tenders) का इस्तेमाल करना शुरू कर रही हैं। इसके अलावा, ग्रीन अमोनिया (Green Ammonia) और ग्रीन मेथनॉल (Green Methanol) के एक्सपोर्ट (Export) की भी लंबी अवधि में संभावना है। जापान (Japan) और साउथ कोरिया (South Korea) जैसे देश, जहां बड़े पैमाने पर रिन्यूएबल एनर्जी जेनरेशन के लिए पर्याप्त जमीन नहीं है, इन हाइड्रोजन डेरिवेटिव्स के लिए भविष्य के प्रमुख बाजार माने जा रहे हैं।

निवेशकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें

निवेशकों के लिए, यह सेक्टर अभी शुरुआती और कैपिटल-इंटेंसिव (Capital-Intensive) फेज में है। मुख्य रूप से यह देखना होगा कि लोकल इलेक्ट्रोलाइजर मैन्युफैक्चरिंग के प्रयास कितने सफल होते हैं, जिससे इक्विपमेंट की लागत कम हो सके, और रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर (Renewable Energy Infrastructure) कितनी तेजी से लगाया जाता है। इसके अलावा, नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) के तहत सरकारी इंसेंटिव्स (Incentives) की स्थिरता महत्वपूर्ण होगी, जब तक कि ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत फॉसिल फ्यूल-आधारित विकल्पों के बराबर नहीं हो जाती। मार्केट ऑयल मार्केटिंग और फर्टिलाइजर कंपनियों से आने वाले नए टेंडर्स से उत्पन्न होने वाली डिमांड के वॉल्यूम पर भी नज़र रखेगा।

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