देश के थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले का स्टॉक खतरनाक स्तर तक गिर गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, करीब **80** प्लांट्स में स्टॉक बेहद कम है और यह सुरक्षित बफर का सिर्फ **38%** ही बचा है। सितंबर में बिजली की मांग में **14%** की जोरदार उछाल के बाद सरकार अब प्लांट्स के लिए Imported Coal और घरेलू कोयले को मिक्स करना अनिवार्य करने पर विचार कर रही है।
स्टॉक का क्या है हाल?
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) के लेटेस्ट डेटा के मुताबिक, थर्मल पावर प्लांट्स के पास कोयले का स्टॉक घटकर 22.3 मिलियन टन रह गया है। यह सुरक्षा के लिए जरूरी 57.8 मिलियन टन (19 दिन का बफर) के मुकाबले महज 38% है। फिलहाल देश के लगभग 80 पावर प्लांट्स कोयले की भारी कमी से जूझ रहे हैं, जिससे ग्रिड की स्थिरता पर भी दबाव बढ़ रहा है।
क्यों बढ़ रहा है संकट?
सितंबर में बिजली की मांग में 14% की बड़ी बढ़ोतरी देखी गई। साथ ही, माइनिंग एरिया में भारी बारिश के कारण घरेलू खदानों से कोयले की सप्लाई प्रभावित हुई है। हालांकि कोल मिनिस्ट्री का कहना है कि खदानों और ट्रांजिट हब पर कुल स्टॉक 114 मिलियन टन के करीब है, लेकिन प्लांट्स तक कोयला न पहुंच पाना बड़ी चुनौती बना हुआ है।
कंपनियों के मार्जिन पर क्या होगा असर?
अगर सरकार अनिवार्य ब्लेंडिंग (Mandatory Blending) का फैसला लेती है, तो पावर जेनरेटिंग कंपनियों को मजबूरन महंगे विदेशी कोयले का इस्तेमाल करना पड़ेगा। फिलहाल भारत अपना 80% Imported Coal इंडोनेशिया से मंगवाता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इंडोनेशियाई, साउथ अफ्रीकन और ऑस्ट्रेलियन कोयले के दाम पिछले साल के मुकाबले ज्यादा हैं, इसलिए बिजली कंपनियों के ऑपरेटिंग कॉस्ट में इजाफा तय है।
अगस्त महीने के आंकड़ों पर नजर डालें तो पावर सेक्टर का कोयला आयात 5.5 मिलियन टन तक पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले 85.6% अधिक है। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पावर कंपनियां इस अतिरिक्त लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल पाएंगी या फिर इससे उनके मार्जिन पर बुरा असर पड़ेगा।
