जानिए कितना हो रहा नुकसान?
सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) को अब पेट्रोल पर ₹20 प्रति लीटर और डीजल पर ₹100 प्रति लीटर का घाटा (under-recovery) हो रहा है। यह घाटा हर दिन लगभग ₹2,400 करोड़ तक पहुंच गया है (27 मार्च 2026 तक के आंकड़े)।
क्यों हो रहा है इतना घाटा?
इस भारी नुकसान की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आई भारी अस्थिरता है। फाइनेंशियल ईयर 26 (FY26) में जहां भारतीय क्रूड बास्केट का औसत दाम $70 प्रति बैरल था, वहीं अप्रैल 2026 में यह बढ़कर $113 प्रति बैरल से ऊपर चला गया है।
बढ़ता आयात बिल और सरकारी कदम
हालांकि भारत कम क्रूड ऑयल आयात कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद देश का रोजाना आयात बिल $190-210 मिलियन तक बढ़ गया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने साफ किया कि राज्य विधानसभा चुनावों के बाद कीमतों में बढ़ोतरी का कोई प्रस्ताव सरकार के विचाराधीन नहीं है। सरकार का लक्ष्य उपभोक्ताओं को कीमत स्थिरता देना है। इसी वजह से 6 अप्रैल 2022 से खुदरा कीमतें अपरिवर्तित हैं, भले ही अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊपर-नीचे होती रही हों।
भारत अपनी जरूरत का 88% से अधिक क्रूड ऑयल आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का असर देश पर पड़ना तय है। खासकर कमजोर रुपये के चलते चालू खाता घाटा (current account deficit) बढ़ने का भी खतरा है। कच्चे तेल की कीमत में हर $1 की बढ़ोतरी से सालाना आयात बिल में लगभग ₹16,000 करोड़ का इजाफा होता है, जो फाइनेंशियल ईयर 25 (FY25) में $137 बिलियन था।
इस बढ़ते दबाव को कम करने के लिए सरकार ने पहले पेट्रोल पर ₹10 प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी घटाई थी। डीजल से एक्साइज ड्यूटी पूरी तरह खत्म कर दी गई थी (जो पहले ₹10 थी)। साथ ही, रिफाइनरियों को घरेलू सप्लाई प्राथमिकता देने के लिए डीजल और जेट फ्यूल के निर्यात पर विंडफॉल टैक्स (windfall tax) भी लगाया गया था।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि अंतरराष्ट्रीय एलपीजी (LPG) बेंचमार्क और घरेलू कीमतों के बीच एक बड़ा अंतर है। जुलाई 2023 से अप्रैल 2026 के बीच अंतरराष्ट्रीय एलपीजी की कीमतें 102% बढ़ी हैं, जबकि घरेलू एलपीजी की कीमतें इसी अवधि में 17% घटी हैं। ये कदम सरकार की ओर से उपभोक्ताओं को कीमत के झटकों से बचाने के प्रयासों को दर्शाते हैं।
