सरकार ने कठिन और गहरे समुद्र (Deepwater) वाले फील्ड्स के लिए गैस की अधिकतम कीमत बढ़ाकर **$9.89** प्रति MMBtu कर दी है, जो मार्च **2027** तक प्रभावी रहेगी। यह कदम Reliance Industries जैसे ऑपरेटरों के लिए निवेश बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है, जबकि फर्टिलाइजर और पावर सेक्टर को महंगाई से बचाने के लिए पुराने फील्ड्स पर **$7** का कैप बरकरार रखा गया है।
उत्पादन को बढ़ावा देने की रणनीति
Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC) ने आधिकारिक तौर पर चुनौतीपूर्ण डीपवॉटर और हाई-प्रेशर क्षेत्रों से निकलने वाली नेचुरल गैस के लिए नई प्राइस सीलिंग जारी कर दी है। 1 अक्टूबर, 2026 से 31 मार्च, 2027 के बीच लागू होने वाली यह नई दर पिछले $8.90 के मुकाबले काफी अधिक है। इस फैसले के पीछे मुख्य मकसद ऐसी जगहों पर काम करने वाली कंपनियों को राहत देना है, जहां गैस की खोज और ड्रिलिंग का खर्च सामान्य फील्ड्स के मुकाबले बहुत ज्यादा होता है।
निवेश बनाम उपभोक्ता राहत
यह बदलाव खास तौर पर Reliance Industries और BP द्वारा संचालित कृष्णा-गोदावरी (KG-D6) बेसिन जैसे प्रोजेक्ट्स को ध्यान में रखकर किया गया है। इन जटिल ब्लॉक्स को विकसित करने में भारी कैपिटल इन्वेस्टमेंट (Capital Expenditure) की जरूरत होती है। सरकार का मानना है कि ऊंची कीमतों के जरिए घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देकर भारत की आयात पर निर्भरता को कम किया जा सकता है।
हालांकि, सरकारी कंपनियों जैसे ONGC और Oil India के लिए सरकार ने अपना रुख सख्त रखा है। पुराने फील्ड्स से निकलने वाली गैस की कीमत $7.00 पर ही सीमित रहेगी, जबकि अक्टूबर 2026 की मौजूदा APM रेट $11.22 है। यह नीति फर्टिलाइजर, पावर और सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए अपनाई गई है।
बाजार का रुख और आगे की राह
वेस्ट एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और ग्लोबल सप्लाई चेन में उतार-चढ़ाव के बीच यह सेक्टर काफी अनिश्चितता का सामना कर रहा है। निवेशकों को यह देखना होगा कि अगर ग्लोबल एनर्जी कीमतें बढ़ती हैं, तो क्या सरकार सब्सिडी का बोझ संभाल पाएगी। साथ ही, अगले कुछ समय में ऑफशोर प्रोजेक्ट्स से गैस का उत्पादन कितना बढ़ता है, यह इस पॉलिसी की सफलता का असली पैमाना होगा।
