सरकार ने 2026-27 सीजन के लिए मक्के से बनने वाले इथेनॉल (Maize-based Ethanol) की खरीद कीमतों में **₹3 प्रति लीटर** की कटौती की है। यह पहला मौका है जब सरकार ने इस फीडस्टॉक की कीमतों में कमी की है, जिससे अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादकों के मार्जिन पर सीधा असर पड़ सकता है।
ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) ने 2026-27 इथेनॉल सप्लाई ईयर की शुरुआत एक बड़े बदलाव के साथ की है। अब तक की सरकारी पॉलिसी में पहली बार मक्के (Maize) से बनने वाले इथेनॉल की खरीद कीमतों में ₹3 प्रति लीटर की कमी की गई है। OMCs ने मौजूदा टेंडर में 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की मांग की है, जिसके चलते इस कटौती का सीधा असर कंपनियों की बैलेंस शीट पर दिखना तय है।
मुनाफे पर क्यों मंडराया खतरा?
इथेनॉल सेक्टर के निवेशकों के लिए यह एक चिंता का विषय है। वे कंपनियां जो पूरी तरह से अनाज आधारित (Grain-based) प्लांट चलाती हैं और मक्के पर निर्भर हैं, उन्हें अब कम रेवेन्यू के साथ काम चलाना होगा। कई कंपनियों पर कर्ज का भारी बोझ है, ऐसे में प्राइस स्टैबिलिटी हटने से उनके कैश फ्लो पर दबाव बढ़ सकता है। अब इन कंपनियों को मुनाफा बचाने के लिए ऑपरेशनल एफिशिएंसी पर एक्स्ट्रा फोकस करना होगा।
शुगर-बेस्ड कंपनियों को राहत
दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने अन्य फीडस्टॉक की कीमतों में कोई छेड़छाड़ नहीं की है। C-हेवी मोलासेस (C-Heavy Molasses) से बनने वाले इथेनॉल की कीमत ₹57.97 प्रति लीटर और खराब अनाज (Damaged foodgrains) की कीमत ₹64 प्रति लीटर पर स्थिर बनी हुई है। इससे शुगर मिलों को एक तरह का सुरक्षा कवच मिल गया है।
इंडस्ट्री में बढ़ी खींचतान
इस फैसले के बाद इंडस्ट्री दो गुटों में बंटती दिख रही है। 'ग्रेन इथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन' (GEMA) ने सरकार के इस कदम का विरोध किया है और कहा है कि इससे मक्के से इथेनॉल बनाने का बिजनेस मॉडल रिस्की हो गया है। वहीं, 'इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन' (ISMA) का कहना है कि सरकार ने अब तक ग्रेन-बेस्ड प्लांटों को ज्यादा तरजीह दी है, जबकि शुगर मिलें लंबे समय से इथेनॉल रेवेन्यू के सहारे गन्ना किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करती रही हैं।
