मिडल ईस्ट में जारी तनाव के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बाधित हो गया है। इससे भारत सहित प्रमुख तेल आयातकों को अब अमेरिका और अफ्रीका से तेल मंगाना पड़ रहा है। इस बदलाव से आयात बिल तो बढ़ ही रहा है, साथ ही इन्फ्लेशन और रिफाइनरी मार्जिन पर भी दबाव बना हुआ है।
ग्लोबल एनर्जी मार्केट 2026 में एक बड़े बदलाव से गुजर रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है, जो दुनिया के कुल तेल प्रवाह का लगभग 20% हिस्सा संभालता है। अब पुरानी शॉर्ट-हॉल रूट की जगह अमेरिका, ब्राजील और गुयाना से लंबी दूरी की सप्लाई ने ले ली है।
बढ़ रही है ढुलाई की लागत
भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के लिए यह सुरक्षा की दृष्टि से एक मजबूरी बन गया है। पहले गल्फ से तेल 3 से 5 दिन में पहुंच जाता था, लेकिन अब अमेरिका या ब्राजील से जहाज आने में 25 दिन तक का समय लग रहा है। यह देरी सिर्फ लॉजिस्टिक चुनौती नहीं है, बल्कि शिपिंग कंपनियों द्वारा वसूले जा रहे ऊंचे फ्रेट रेट्स और इंश्योरेंस प्रीमियम ने हर बैरल पर एक परमानेंट 'वॉर प्रीमियम' जोड़ दिया है।
रिफाइनरियों के सामने चुनौती
भारत ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए ब्राजील से आयात बढ़ाया है, लेकिन इससे तकनीकी समस्याएं पैदा हो रही हैं। भारतीय रिफाइनरियां मिडल ईस्ट के क्रूड के हिसाब से डिजाइन की गई थीं। अब उन्हें पश्चिमी देशों से आने वाले अलग ग्रेड के क्रूड के लिए अपने इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव करना पड़ रहा है, जिससे अतिरिक्त लागत आ रही है। अगर कंपनियां इस बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों तक नहीं पहुंचा पाती हैं, तो इसका सीधा असर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ेगा।
सप्लाई चेन का जोखिम
दुनिया भर में स्ट्रेटेजिक रिजर्व कम होने के कारण एनर्जी सिस्टम पर दबाव है। निवेशकों को आने वाले समय में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भारत के मंथली फ्यूल इंपोर्ट बिल पर नजर रखनी चाहिए। नई ऊर्जा व्यवस्था कितनी टिकाऊ होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या सप्लाई चेन की लागत स्थिर हो पाएगी और क्या गैर-मिडल ईस्ट देश उत्पादन का मौजूदा स्तर बरकरार रख पाएंगे।
