इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने साल 2026 के लिए ग्लोबल ऑयल डिमांड में **2.6 मिलियन बैरल** प्रतिदिन की गिरावट का अनुमान जताया है। भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक सुस्ती के चलते एनर्जी मार्केट में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है, जिसका असर भारतीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर पड़ सकता है।
ग्लोबल एनर्जी मार्केट फिलहाल भारी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। IEA की अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल ऑयल डिमांड में 2.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mb/d) की कमी आने वाली है। यह गिरावट आर्थिक मंदी और खास तौर पर ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव के कारण सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों का नतीजा है।
सप्लाई चेन में बड़ी चुनौती
IEA के आउटलुक के अनुसार, 2026 में ग्लोबल ऑयल सप्लाई औसतन 100.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल के मुकाबले 5.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन की भारी गिरावट है। मध्य पूर्व, विशेषकर ईरान में जारी संघर्ष ने शिपिंग रूट्स को बुरी तरह प्रभावित किया है। सबसे ज्यादा मार डीजल की मांग पर पड़ने वाली है, जो कुल गिरावट का 25% हिस्सा हो सकती है। हालांकि 2027 में 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन की आंशिक रिकवरी की उम्मीद है, लेकिन खपत 2025 के स्तर से 620,000 बैरल प्रतिदिन नीचे ही रहेगी।
भारतीय निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
भारत दुनिया के सबसे बड़े क्रूड ऑयल इम्पोर्टर्स में से एक है, इसलिए हमारी मैक्रो-इकोनॉमी का सीधा नाता ग्लोबल एनर्जी प्राइस से है। क्रूड की कीमतों में उतार-चढ़ाव स्थानीय ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के मार्जिन को सीधे प्रभावित करता है।
फिलहाल एशिया और यूरोप में रिफाइनरी मार्जिन काफी दबाव में है, जिसकी मुख्य वजह शिपिंग और क्रूड की ऊंची लागत है। हालांकि डिमांड कम होने से क्रूड के दाम नरम हो सकते हैं, लेकिन सप्लाई में कमी की वजह से कीमतों में उछाल का रिस्क बना हुआ है। घरेलू निवेशकों को अब अंतरराष्ट्रीय क्रूड बेंचमार्क, OPEC+ के फैसलों और गल्फ रीजन में बढ़ते तनाव पर बारीक नजर रखनी होगी, क्योंकि ये फैक्टर भारतीय अर्थव्यवस्था में इन्फ्लेशन और ट्रेड डेफिसिट को प्रभावित कर सकते हैं।
