Global Energy Crisis: ग्रिड फेलियर से दुनिया भर में **500 GW** के प्रोजेक्ट्स ठप, भारत के लिए क्या हैं मायने?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Global Energy Crisis: ग्रिड फेलियर से दुनिया भर में **500 GW** के प्रोजेक्ट्स ठप, भारत के लिए क्या हैं मायने?

Hitachi Energy के सीईओ ने चेतावनी दी है कि दुनिया भर में **500 GW** के रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स केवल ग्रिड कनेक्टिविटी न होने के कारण अटके हुए हैं। भारत के लिए यह एक बड़ा संकेत है, जहां विकसित देशों के बराबर पहुँचने के लिए ऊर्जा आपूर्ति को **8 गुना** बढ़ाने की जरूरत है।

दुनिया भर के एनर्जी मार्केट में एक गंभीर समस्या खड़ी हो गई है, जिसका सीधा असर भारत की लॉन्ग-टर्म इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग पर पड़ रहा है। Hitachi Energy के सीईओ Andreas Schierenbeck ने बताया है कि दुनिया भर में करीब 500 GW के पावर प्रोजेक्ट्स ऐसे हैं, जो बिजली बनाने के लिए तो तैयार हैं, लेकिन ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर होने के चलते वे बिजली घरों तक नहीं पहुँचा पा रहे हैं। यह 'ग्रिड बॉटलनेक' ग्लोबल स्तर पर डी-कार्बोनाइजेशन के लक्ष्यों में सबसे बड़ी रुकावट बन गया है।\n\nभारतीय निवेशकों के लिए यह एक बड़ा सबक है कि बिजली उत्पादन (Generation) ही सब कुछ नहीं है, उसे सही जगह पहुँचाना (Transmission & Distribution) उससे भी ज्यादा जरूरी है। अगर ग्रिड बिजली उत्पादन की रफ्तार के साथ कदम नहीं मिला पाया, तो नई कैपेसिटी बेकार पड़ी रहेगी, जिससे यूटिलिटी कंपनियों और एनर्जी प्रोड्यूसर्स के रिटर्न पर बुरा असर पड़ सकता है।\n\nभारत की चुनौती बड़ी है। भारत में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत अभी करीब 2 KWh है, जबकि OECD देशों का औसत 20 KWh है। इस अंतर को मिटाने के लिए भारत को अपनी कुल ऊर्जा आपूर्ति को 8 गुना बढ़ाना होगा। इसका मतलब सिर्फ नए पावर प्लांट लगाना नहीं, बल्कि एक ऐसा विशाल ट्रांसमिशन नेटवर्क तैयार करना है जो इस भारी लोड को संभाल सके।\n\nइस इंफ्रास्ट्रक्चर गैप से पावर इक्विपमेंट सेक्टर के लिए बड़े मौके बन रहे हैं। हाई-वोल्टेज लाइन्स, स्मार्ट ग्रिड टेक्नोलॉजी, ऑटोमेटेड स्विचगियर और एडवांस ट्रांसफॉर्मर्स की डिमांड बढ़ने वाली है। Power Grid Corporation of India जैसी बड़ी कंपनियां और इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट निर्माता 'ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर' बनाने के काम में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं।\n\nहालांकि, इस सफर में रिस्क भी कम नहीं हैं। जमीन अधिग्रहण की रफ्तार, DISCOMs की खराब आर्थिक स्थिति, कॉपर और स्टील जैसे रॉ मटेरियल की उपलब्धता और ग्रिड में एनर्जी स्टोरेज को इंटीग्रेट करने की चुनौती जैसे फैक्टर्स पर निवेशकों को बारीकी से नजर रखनी होगी। ग्रिड का सही विस्तार ही यह तय करेगा कि भारत अपने लॉन्ग-टर्म ग्रोथ टारगेट्स को हासिल कर पाएगा या नहीं।

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