दुनिया भर में **43%** क्रूड ऑयल प्रोडक्शन पर संकट के बादल छाए हैं और रिफाइनिंग क्षमता में **10%** की गिरावट आई है। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी आयात पर निर्भर है, वहां इस उथल-पुथल से महंगाई और ट्रेड डेफिसिट बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
दुनिया भर के एनर्जी मार्केट इस समय पिछले कई दशकों के सबसे बड़े सप्लाई क्राइसिस से गुजर रहे हैं। भू-राजनीतिक तनाव के चलते हर दिन लगभग 4.5 करोड़ बैरल कच्चे तेल का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। यह कुल ग्लोबल आउटपुट का करीब 43% है। मिडिल ईस्ट और रूस जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सप्लाई चेन की बाधाओं ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। पिछले 6 महीनों में हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि बड़े देशों के पास मौजूद स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व भी अब काफी हद तक खाली हो चुके हैं।
रिफाइनिंग क्षमता पर चोट
सिर्फ कच्चा तेल निकालना ही मुश्किल नहीं हुआ है, बल्कि उसे ईंधन में बदलने की क्षमता भी कम हो गई है। रूस-यूक्रेन संघर्ष वाले इलाकों में रिफाइनरियों को निशाना बनाए जाने से ग्लोबल रिफाइनिंग कैपेसिटी में 10% की भारी कमी आई है। इससे डीजल और पेट्रोल जैसे जरूरी ईंधनों की आपूर्ति तंग हो गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण ट्रांजिट रूटों पर बढ़ते तनाव ने ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट को बढ़ा दिया है, जिसका असर फ्यूल की फाइनल कीमतों पर साफ दिख रहा है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से ज्यादा आयात करता है। इंटरनेशनल मार्केट में कीमतें बढ़ने का सीधा मतलब है भारत का इम्पोर्ट बिल बढ़ना, जिसका असर रुपये की चाल और ट्रेड डेफिसिट पर पड़ेगा। जैसे-जैसे फ्यूल की कीमतें बढ़ेंगी, 'कॉस्ट-पुश इन्फ्लेशन' का खतरा बढ़ जाएगा, जो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए महंगाई को काबू में रखने की चुनौती को और कठिन बना सकता है।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों की नजरें अब घरेलू ऑइल कंपनियों पर हैं। ONGC और Oil India जैसी अपस्ट्रीम कंपनियां ऊंची कीमतों का फायदा उठा सकती हैं, हालांकि उन पर विंडफॉल टैक्स का बोझ बना रहता है। दूसरी ओर, IOC, BPCL और HPCL जैसी ओएमसी (OMCs) के लिए स्थिति पेचीदा है। अगर इंटरनेशनल कीमतें बढ़ने के बावजूद भारत में रिटेल फ्यूल के दाम नहीं बढ़ाए गए, तो कंपनियों के मार्जिन पर बुरा असर पड़ेगा और उन्हें अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ सकता है।
आने वाले समय में निवेशकों को यह देखना होगा कि सरकार फ्यूल की कीमतों को कैसे मैनेज करती है और महंगाई को रोकने के लिए क्या पॉलिसी कदम उठाती है।
