ग्लोबल मार्केट में डिस्टिलेट क्रैक स्प्रेड **$100** प्रति बैरल के पार निकल गया है, जो रिफाइंड फ्यूल की ऐतिहासिक कमी को दर्शाता है। जियोपॉलिटिकल तनाव और कम इन्वेंट्री के कारण अमेरिकी बाजार में डीजल **$6** प्रति गैलन तक पहुंच गया है, जिससे ग्लोबल इन्फ्लेशन बढ़ने की चिंता गहरा गई है।
एनर्जी मार्केट में इस समय रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की सप्लाई को लेकर भारी संकट बना हुआ है। डिस्टिलेट क्रैक स्प्रेड—जो क्रूड ऑयल और डीजल-जेट फ्यूल जैसी तैयार चीजों के बीच के अंतर को मापता है—अब $100 प्रति बैरल से ऊपर निकल चुका है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि ग्लोबल इकोनॉमी के लिए एक चेतावनी है। जब यह अंतर इतना बढ़ जाता है, तो साफ है कि तैयार ईंधन की भारी किल्लत है, जिससे कच्चे तेल के दाम से अलग हटकर महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है।
आपूर्ति में कमी की मुख्य वजह
सप्लाई में यह संकट कई जियोपॉलिटिकल कारणों से है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव, अमेरिका-ईरान स्थिति और रूसी रिफाइनरियों से घटते आउटपुट ने दुनिया भर में ईंधन की कमी कर दी है। आंकड़ों के अनुसार, डिस्टिलेट इन्वेंट्री 5-वर्षीय मौसमी औसत से 13 से 14 प्रतिशत नीचे है। इसका सीधा असर अमेरिका जैसे देशों में दिख रहा है, जहां डीजल की खुदरा कीमतें $6 प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर पर हैं।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों के नजरिए से स्थिति मिली-जुली है। रिफाइनिंग कंपनियों जैसे Reliance Industries, Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum, और Hindustan Petroleum के लिए उच्च क्रैक स्प्रेड का मतलब ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRM) में सुधार हो सकता है। जब क्रूड की लागत और तैयार उत्पाद की कीमत के बीच का अंतर बढ़ता है, तो रिफाइनर प्रति बैरल अधिक मुनाफा कमा सकते हैं।
हालांकि, मैक्रो लेवल पर यह स्थिति चिंताजनक है। ईंधन की बढ़ती कीमतों से 'डिमांड डिस्ट्रक्शन' का खतरा है, जहां महंगे फ्यूल के कारण उद्योग और कंज्यूमर खर्च कम कर देंगे। अगर यह स्थिति बनी रही, तो दुनिया 'स्टैगफ्लेशन' (stagflation) की ओर बढ़ सकती है, जिससे सेंट्रल बैंकों के लिए ग्रोथ और महंगाई के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो जाएगा। निवेशकों को अब केवल क्रूड के भाव नहीं, बल्कि रिफाइनिंग कैपेसिटी यूटिलाइजेशन और इन्वेंट्री डेटा पर नजर रखनी चाहिए।
