जर्मनी ने अपने '2026 Climate Action Programme' का ऐलान कर दिया है, जिसका लक्ष्य 2045 तक नेट-जीरो एमिशन हासिल करना है। इस **67** सूत्रीय योजना के जरिए देश विंड एनर्जी और हाइड्रोजन पर जोर देगा, जो ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए बड़े बदलावों के संकेत हैं।
जर्मनी ने आधिकारिक तौर पर '2026 Climate Action Programme' पेश किया है, जो देश को कोयले, तेल और गैस की निर्भरता से बाहर निकालने की एक बड़ी कोशिश है। हालांकि 2025 तक रिन्यूएबल एनर्जी से 55% बिजली मिल रही है, लेकिन 2024 में भी कुल एनर्जी खपत में 65% हिस्सा फॉसिल फ्यूल्स का ही रहा है। इस प्लान के तहत सरकार विंड एनर्जी कैपेसिटी को 12 गीगावाट बढ़ाने और इंडस्ट्रियल सेक्टर में हाइड्रोजन के इस्तेमाल पर जोर दे रही है।\n\n### इंडस्ट्री पर असर और कार्बन कॉस्ट\n\nभारी उद्योगों को कार्बन-मुक्त बनाना इस रोडमैप का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा है। सरकार अब 'कार्बन कॉन्ट्रैक्ट्स फॉर डिफरेंस' जैसे मैकेनिज्म ला रही है, ताकि क्लीन एनर्जी अपनाने वाली कंपनियों को वित्तीय मदद मिल सके। ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए यह जरूरी है क्योंकि यूरोप में अब सख्त कार्बन मानक लागू हो रहे हैं, जो ग्रीन टेक्नोलॉजी और रिन्यूएबल इक्विपमेंट की डिमांड को बदल देंगे।\n\n### ट्रेड पॉलिसी और विवाद\n\nइस रोडमैप पर वैश्विक स्तर पर सवाल भी उठ रहे हैं। एक तरफ देश नेट-जीरो का लक्ष्य रख रहा है, वहीं दूसरी तरफ विदेशों में फॉसिल फ्यूल प्रोजेक्ट्स की फंडिंग जारी है। एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी के नियमों में बदलाव से करीब 40% प्रोजेक्ट्स पर जलवायु समीक्षा (climate assessment) का असर कम हो सकता है। इसके अलावा, कोयले के इस्तेमाल को बंद करने की डेडलाइन 2038 से घटाकर 2030 करने पर भी बहस तेज है। निवेशकों को अब कार्बन-बेस्ड इंसेंटिव्स और भविष्य में आने वाले 'कार्बन बॉर्डर टैक्स' पर नजर रखनी चाहिए।
