गुजरात इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (GERC) ने एक अहम फैसला सुनाया है। अब विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स में जमीन (Right-of-Way) मिलने में आने वाली गंभीर रुकावटों को 'Force Majeure' यानी अप्रत्याशित घटना माना जाएगा। इस फैसले से डेवलपर्स को प्रोजेक्ट की डेडलाइन बढ़ाने का मौका मिलेगा और वे भारी जुर्माने से बच सकेंगे।
क्या है GERC का फैसला?
गुजरात इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (GERC) ने अपने एक नए आदेश में साफ कर दिया है कि विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन (Right-of-Way) हासिल करने में आने वाली बड़ी रुकावटों को 'Force Majeure' यानी अप्रत्याशित घटना माना जाएगा। Force Majeure एक कानूनी शब्द है जिसका मतलब है ऐसी अनहोनी घटना जो किसी के कॉन्ट्रैक्ट को पूरा करने में बाधा डाले। इस फैसले के बाद, रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर्स को प्रोजेक्ट की समय-सीमा बढ़ाने की अर्जी देने की इजाजत मिल गई है, जिससे वे प्रोजेक्ट में देरी होने पर लगने वाले भारी जुर्माने से बच सकते हैं।
Juniper Green का मामला
यह फैसला रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर Juniper Green और गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (GUVNL) के बीच एक विवाद के बाद आया है। Juniper Green ने अपनी 50 MW की विंड एनर्जी प्रोजेक्ट को पूरा करने में हुई देरी के लिए सुरक्षा की मांग की थी। कंपनी का तर्क था कि जमीन तक पहुंच बनाने में आई रुकावटों के कारण वे तय समय-सीमा का पालन नहीं कर सके। GERC ने मामले की जांच की और आंशिक राहत दी। कमीशन ने माना कि जब स्थानीय विरोध इतना गंभीर हो जाए कि पुलिस सुरक्षा की जरूरत पड़े, तो यह मामला डेवलपर के नियंत्रण से बाहर की घटना बन जाता है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह अहम?
भारत के पावर सेक्टर में, ज्यादातर विंड और सोलर प्रोजेक्ट्स पावर परचेज एग्रीमेंट (PPAs) के तहत तय समय-सीमा के साथ काम करते हैं। प्रोजेक्ट में देरी होने पर आमतौर पर लिक्विडेटेड डैमेजेज (LD) के रूप में जुर्माना लगाया जाता है। यह जुर्माना प्रोजेक्ट के मुनाफे और कैश फ्लो को नुकसान पहुंचा सकता है। अब, GERC के इस फैसले से कि जमीन हासिल करने में अत्यधिक कठिनाई 'Force Majeure' की श्रेणी में आ सकती है, डेवलपर्स को एक बड़ी सुरक्षा मिली है। इससे जमीन अधिग्रहण या साइट तैयार करने के दौरान होने वाले अनियंत्रित स्थानीय विरोध के कारण अचानक होने वाले वित्तीय नुकसान का खतरा कम हो गया है।
जमीन तक पहुंच की असलियत
भारत में रिन्यूएबल एनर्जी कंपनियों के लिए जमीन का अधिग्रहण और साइट तक पहुंच हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। अक्सर प्रोजेक्ट रिमोट इलाकों में प्लान किए जाते हैं, जहां स्थानीय समुदाय निर्माण का विरोध कर सकते हैं, जिससे प्रदर्शन या रास्ता जाम हो सकता है। इस फैसले से पहले, ऐसी देरी को अक्सर कंपनी की अंदरूनी समस्या माना जाता था, और डेवलपर को चूकने की पूरी जिम्मेदारी लेनी पड़ती थी। हालांकि यह फैसला कुछ राहत देता है, लेकिन यह हर तरह की देरी पर लागू नहीं होता। यह खास तौर पर उन स्थितियों को संबोधित करता है जहां रुकावट की गंभीरता अत्यधिक साबित हो।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या यह मिसाल दूसरे राज्यों के रेगुलेटर्स को भी इसी तरह के नियम अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है, क्योंकि जमीन की समस्याएं सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रहेगी कि डेवलपर यह साबित कर पाएं कि जमीन तक पहुंच में आई बाधाएं वाकई उनके नियंत्रण से बाहर थीं। भविष्य में, प्रोजेक्ट के इंटरनल रेट ऑफ रिटर्न (IRR) पर इसका असर सबसे अहम होगा, क्योंकि जुर्माने के जोखिम में कमी भविष्य में विंड एनर्जी क्षमता के विस्तार को वित्तीय रूप से और मजबूत बना सकती है।
